Thursday, August 3, 2017

"बेबी बॉटल " ख़त्म करने के लिए भारत क्या नार्वे के रास्ते पर चल सकता है ?

नार्वे में में बच्चे के दूध के लिए ‘बेबी बॉटल ’ ढूंढना दुर्लभ कह सकते हैं. डिजाइनदार तो छोड़ ही दें. वहां बोतल से दूध पीते बच्चे बस-ट्रेन कहीं नहीं मिलते. हर सार्वजनिक स्थलों और ऑफिसों में स्तनपान के कमरे हैं.
मेरी एक कर्मचारी जब लगभग एक साल की छुट्टी के बाद लौटीं, ‘रोस्टर’ बना. मैने देखा कि एक घंटे के दो ‘पॉज़’ हैं. मुझे समझ नहीं आया, फिर देखा ‘अम्मो’ लिखा है, मतलब स्तनपान का
विराम. दो घंटे प्रतिदिन का विराम है जिससे वो पास के ‘क्रेच’ में जाकर स्तनपान करा आएंगीं.
70 के दशक में ऐसा नहीं था. पूरा नॉर्वे ‘फॉर्मूला मिल्क’ और बोतल का फैन हो चला था. नया-नया अमरीकी फैशन चला था. नॉर्वे तब अमीर न था, अमरीका की नकल उतारता था. स्तनपान लगभग न के बराबर हो रहे थे. तभी एक महिला मिसेज हेलसिंग ने एक ‘कैम्पेन’ चलाया और स्वास्थ्य मंत्रालय में एक अधिकारी से मिलीं. भाग्य से वह अधिकारी भी हार्वर्ड से इसी संबंध में शोध कर आई थीं, और उनके पेट में चौथा बच्चा था. उन्होनें अपने बच्चे का स्तनपान ही कराया, बोतल नहीं लगाया.
वही अधिकारी आगे चल कर नॉर्वे की प्रधानमंत्री बनीं, और इस मुहिम में ‘डोर-टू-डोर’ कैम्पेन में जुट गईं. प्रधानमंत्री ने आखिर खुद अपने बच्चे को दूध पिलाकर शुरूआत की थी. बात जम गई. नॉर्वे से बोतल हमेशा के लिए खत्म हो गया.
दुनिया भर में 120 से ज़्यादा देश एक अगस्त से सात अगस्त तक अंतरराष्ट्रीय स्तनपान सप्ताह मना रहे हैं. इसका मकसद है कि बच्चे के लिए पहले 6 महीने मॉं का दूध सबसे ज़रुरी है ,लेकिन भारत जैसे मुल्क में अब महिलाओं बच्चों को स्तनपान कराने से बचने की कोशिश कर रही हैं जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है .

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