Saturday, July 8, 2017

Parenting के सही फार्मूले के 10 अहम टिप्स



मेरी नई पड़ोसन अक्सर अपने दो साल के बेटे की बातें मुझसे शेयर करती रहती हैं. वे पूछती हैं कि पेरेन्टिंग का सही तरीका और फार्मूला क्या है? वे इस चिंता में है कि बच्चे की परवरिश किस तरह की जाए?  मैं भी छह महीने के बच्चे की मां हूं. मेरा भी इस मामले में ज्यादा अनुभव नहीं हां लेकिन मैंने अपनी मां से बहुत कुछ सीखा है जिसने हम तीन बहनों की परवरिश कुछ इस तरह से की आज हम न केवल अपने पैरों पर खड़े हैं बल्कि समाज में
अपनी एक पहचान भी बनाई है.    
बच्चों को अच्छी परवरिश हो तो उनके भविष्य का निर्माण बेहतर होता है. बचपन में जैसी नींव पड़ती है आगे चलकर वह बच्चों केव्यक्तित्व यानी पर्सेनिलिटी, उनकी सोच और विचार पर प्रभाव डालती है. बच्चों की अच्छी परवरिश किसी रटे-रटाए ढर्रे पर नहीं चलती बल्कि यह व्यक्ति और परिवार की परिस्थितियों पर निर्भर करती है, लेकिन कुछ बातें है जिसका ध्यान यदि हर मां-बाप रखें तो बच्चों में अच्छे संस्कार डाले जा सकते हैं.
मेरी मां ने हमेशा यह ध्यान रखा कि बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए यह ज़रूरी है कि घर का माहौल पॉजिटिव  हो. परिवार के दूसरे सदस्यों के रहन सहन और उनकी आदतें भी बच्चों की परवरिश को प्रभावित करती है. इसलिए बच्चों के हमारे लालन-पालन में उन्होंने कुछ बातों का ख़्याल जरुर रखा.

आपसे भी वे शेयर करती हूं वो कुछ खास जरुरी बातें…

1)बच्चों की आदत और पसंद-नापसंद को समझना ज़रूरी है जिस आधार पर बच्चों की ज़रूरत समझ आ सके.
2)बचपन से ही बच्चों से ऐसे पेश आए कि वो बेझिझक अपनी बात खुलकर आपको बता सके.
3)मां-पिता होते हुए भी फ्रेंड्स के दोस्त बनकर रहे. इससे उनके साथ नज़दीकी बढ़ेगी और अभिभावक के प्रति सम्मान भी बढ़ेगा.
4)बच्चों को दूसरों का सम्मान करना और ज़रूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करें. 
5)अपनी ख़ुशी के लिए कोई भी बात बच्चों पर ज़बरन थोपे नहीं. वो जैसा है वैसा ही रहने दें. दिखावे के लिए उसे बदलने या फिर दूसरों की कापी करने के लिए दबाव नहीं डाले.
6)उसके लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है  इसे प्यार से समझाए.
7)बच्चों से ऊंची आवाज़, अपशब्द या फिर गाली गलौज में बातें बिल्कुल भी नहीं करे. 
8)वहीं आपको दूसरे बच्चों से तुलना  करने से भी परहेज़ करना चाहिए. यह बच्चों में कुंठा का कारण बन जाता है और वह खुद को कमतर समझने लगता है.
9)हरेक बच्चा अनोखा होता है और उसमें कुछ विशेष गुण होते हैं जो उसे दूसरे से अलग बनाते हैं. बस ज़रूरत है बच्चे की उस प्रतिभा को पहचानने की. उसकी पसंद और विशेष गुण को पहचान कर उसको निखारने की कोशिश करें.
10)कभी कभी बच्चों की सारी बातें मानना बेवक़ूफ़ी होगी. उसकी ज़रूरत को समझ कर डिमांड पूरी करें. दरअसल छोटी उम्र में उन्हें सही ग़लत की परख नहीं होती इसलिए चीज़ों को समझने में मदद करे. बच्चे के लिए कोई बात सही है या नहीं है इसकी परवाह करना ज़रूरी है. प्यार-दुलार में बच्चे को ज़िद्दी नहीं बनने दे. 
प्रियंवदा सहाय:

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