Friday, July 7, 2017

सच मानिए , मॉं-बाप की शादी में यहां बच्चे भी शामिल हो जाते हैं

राजस्थान के सिरोही जिले में गरासिया जनजाति (Garasia Tribes)  है, जिन्हें “कुंवारे देश का आदिवासी” कहा जाता है, क्योंकि इनकी मुख्य विशेषता इनकी परम्परा है. इनके प्रचलित मेले में अविवाहित लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पसंद कर भगाकर छोटी उम्र में ही married life करने
लगते हैं. वे लंबे समय तक Live in Relationship में रहते हैं.
वे औपचारिक और पूरे रिति-रिवाज से शादी तब करते हैं, जब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं. लेकिन ऐसा करने में काफी उम्र गुजर जाती है. कई बार वे बुढ़ापे में शादी करते हैं तब तक इनके बच्चें भी बड़े हो जाते हैं. वो भी अपने माता-पिता के विवाह में शामिल होते है.
गरासिया जनजाति के के मेले धार्मिक आध्यात्मिक सरोकार से जुड़े हुए हैं. वे यहां मृतकों की अस्थि विसर्जन करते हैं. कार्तिक पूर्णिमा पर माउंट आबू नक्की झील पर मेला लगता है. मुझे जाने का अवसर मिला. मेले में युवक अपने पसंद की युवती को प्रेम प्रस्ताव रखते हुए छेड़ता रहेगा. युवती का  सकारात्मक रवैया लगता है तो पूरे मेले में युवती का पीछा करता रहेगा.  यहां प्रेम-प्रस्ताव युवक ही रखता है और युवती की सहमति के बाद वे मेले से ही भाग जाते हैं.
यहां छेड़छाड़ से मतलब समझें  लड़का-लड़की के पास जाकर उसके बाल, गाल, हाथ, कमर को छूकर रोमांस करेगा और बेझिझक प्रेम प्रस्ताव रखेगा. आमतौर पर लड़की और उसके घर के सदस्यों को कोई आपत्ति नहीं होती. जहां भी नजर पड़ी वहां रोमांस भरी हरकते देख, मैं हक्का-बक्का रह गया. युवती जवाब देकर चलती बनेगी और अन्य लोग दर्शक बनें ठहाके लगाएंगे. कई बार एक ही लड़की को पूरे मेले में कई लड़के छेड़ते हैं लेकिन फिर भी यहां युवती की सहमति होना बहुत जरुरी है.
पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है, गंधर्व विवाह परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना ‘गंधर्व विवाह’ कहलाता है. दुष्यंत ने शकुन्तला से ‘गंधर्व विवाह’ किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम “भारतवर्ष” बना. इसी प्रकार गरासिया जनजाति में यह कह सकते हैं कि सामूहिक गंधर्व विवाह करने के ही बहुत बड़े स्थान निर्धारित है.
मेरा एक सवाल और उन तमाम बुद्धिजीवी समाज सेवकों के लिए है जो आजकल विभिन्न समाजों में अविवाहित युवक युवतियों के लिए परिचय सम्मेलन आयोजित करते हैं. यह सम्मेलन अब आयोजित होने लगे हैं, क्यों जरूरत पड़ी इसकी? वो इस काम में कितने सफल होते है? पता नहीं, पर यहां आदिवासी मेले में तो मैंने संबंध खुद जोड़ते देखे हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि आज कल जो परिचय सम्मेलन आयोजित होते हैं वे आदिवासी संस्कृति की देन है.
संदीप कुमार मेघवाल,चित्रकार एवं शोधार्थी दृश्य कला
(Courtesy: Focus Bharat)


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