Saturday, June 24, 2017

बिहार की चंचल को क्यों हारने दी आपने ज़िंदगी की दौड़ ?


प्रतिभा ज्योति
एसिड अटैक सर्वाइवर चंचल पासवान ने इस क्रूर समाज को आखिर छोड़ दिया. बिहार में पटना के पास दानापुर के छितनामा गांव की बहादुर लड़की चंचल पासवान ने 22 जून को आखिरी सांस ली .अपने पर एसिड से हुए हमले और अन्याय के ख़िलाफ़ चंचल पांच साल तक लड़ती रही, लेकिन उसके अपराधियों को वो सज़ा नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी . चंचल के पिता शैलेश पासवान ने कहा कि वो आखिरी दम तक बहादुरी से लड़ती रही,लेकिन अब मैं हार गया हूं .
मेरी किताब एसिड वाली लड़की पर काम करते हुए चंचल से मुलाकात हुई थी.मैं उससे मिलने उसके घर दानापुर भी गई थी ,लेकिन उससे अहम बात ये कि जब किताब रिलीज हुई तो वो बहादुर लड़की एक हज़ार किलोमीटर का सफर पार करके दिल्ली आ गई थी .उस समारोह में भी चंचल ने कहा था कि उसकी और एसिड अटैक के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वालों की असली जीत तब होगी जब समाज में फिर से किसी को चंचल ना बनना पड़े.
चंचल अपने नाम से विपरीत गंभीर स्वभाव की थी और नपढ़,गरीब मजदूर परिवार की उस बेटी की सपना था कम्प्यूटर इंजीनियर बनना, वो कम्प्यूटर कोर्स भी कर रही थी. उसकी बहन सोनाली और चंचल दोनों शिद्दत से अपनी जिंदगी के अंधेरे को दूर करने में लगे थे,लेकिन मौहल्ले के चार लड़कों के लिए तो वो सिर्फ एक लड़की , एक जवान शरीर थी .एक लड़के ने उससे शादी करने कि जिद की,उसने मना कर दिया क्योंकि वो पढ़ना चाहती थी.उसकी इस ना का अंजाम हुआ उस पर एसिड अटैक .
2012 में अक्टूबर की हल्की सर्द रातों में दुर्गा पूजा के उत्सव की गर्माहट महसूस हो रही थी. 21 अक्टूबर की रात जब वो अपने घर की छत पर बहन सोनाली के साथ सो रही थी ,तो वो चारों लड़के आए और दो ने उसके हाथ पैर पकड़े, मुंह दबाया और एक ने बोतल से निकाल कर कटोरे में भर कर उस पर एसिड उंडेल दिया.लगा कि खौलता हुआ तेल उस पर उंडेला जा रहा है .उसके चिल्लाने की आवाज़ से सुनकर जब पिता शैलेश पासवान और मॉं सुनयना जब तक छत पर भागे तो देखा, चंचल बुरी तरह छटपटा रही थी .उसके चेहरे से धुंआ निकल रहा था .जैसे मोमबत्ती पिघलती है,उस तरह चंचल का चेहरा और पूरा शरीर पिघल रहा था .दूसरी बहन सोनम का बी हाथ और सीना जख्मी हो गया था. आंगन में लिटा कर बाल्टी भर भर कर पानी डाल तपिश कम करने की कोशिश की ..उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ.पिता मदद के लिए मोहल्ले की तरफ भागे,लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आया.मानो पूरा मोहल्ला बुत बन गया था.ज़िंदा शरीरों के बुतों का मौहल्ला. वो उन्हें अस्पताल लेकर भागे ..भागते रहे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल. पटना के सबसे बड़े पीएमसीएच अस्पताल पहुंचे ,उसे आईसीयू में रखना ज़रूरी था ,लेकिन दो ज़िंदा इंसानों को मुर्दाघर में रखा गया क्योंकि आईसीयू सिर्फ वीवीआईपी लोगों के लिए होता है.
लंबी लड़ाई लड़ी मॉ-पिता ,चंचल और सोनम ने कुछ एनजीओ ने साथ दिया , कानूनी लड़ाई भी लड़ी . थोड़ी मदद मिली, तोड़ी नहीं मिली. बिहार के एनजीओ परिवर्तन केन्द्रकी वर्षा जावलेगकर और दिल्ली में एसिड अटैक कैंपेन चलाने वाले आलोक दीक्षित ने मदद की .चंचल के वकील सुरेश प्रसाद मिश्रा कानूनी लड़ाई लड़ते रहे.लेकिन अदालत ने आरोपी को कम उम्र का मानते हुए एक साल की सज़ा दी ,बाल सुधार गृह में भेज दिया गया उसे और वो अब चंचल के घर के सामने से शान से निकलता है अंगूठा दिखाते हुए, चरमराती न्याय व्यवस्था को और गिलगले समाज को,  लेकिन गांव वालों ने उसके जज़्बे को भले ही सलाम नहीं किया हो,मगर बहादुर चंचल फिर से कालेज जाने लगी थी.
चंचल तो अब नहीं है ,अब भी अगर आप जाग गए हैं, आपकी और हमारी आत्मा हमे कचोट रही है तो बस इतनी कोशिश कीजिए कि अब फिर किसी को चंचल की तरह से ना गुजरना पड़े .फिर कोई चंचल नहीं बने .
याद रखिए चंचल हमेशा दूसरे या पड़ौसी के घर की लड़की नहीं होती ,वो आपके घर में भी हो सकती है,यह चेतावनी है तो आप सिर्फ मोमबत्ती मत जलाइए दिल्ली के राजपथ और इंडिया गेट पर.खड़े होइए ,बोलिए, लड़िए, मदद कीजिए और कोशिश कीजिए कि फिर ऐसी कहानी ना लिखनी पड़े.

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