Monday, November 16, 2015

सूर्यास्त



अक्सर खौफ सा होता है मुझे
जब देखती हूँ सूर्यास्त को...
बालकनी में खड़े होकर धीरे धीरे नीचे झुकते सूरज को
देखती हूँ..और महसूस करती हूँ
अपने वजूद को खोने का...
ये खौफ उम्र के साथ बढ्ने लगा है

सूरज के उगने और डूबने का
सिलसिला चलता रहेगा...
और उसके साथ हीं फैलती रहेंगी
असंख्य रश्मियां..मगर कभी ऐसा भी हो
कि ये 'रश्मिकहीं सदा के लिये खो जाए
और उसका वजूद किन्हीं अँधेरों में
मिल जाए...पर मेरे दोस्तों
एक 'रश्मिके मिट जाने से 
जहां में अंधेरा नहीं होता...
प्रकृति अपनी नियति के साथ 
चलती रही है...चलती रहेगी...!!!

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