Monday, September 2, 2013

let people decide-xclusive thomas


विजय त्रिवेदी
सहयोगी- प्रतिभा ज्योति
वोट गारंटी बिल हैतो जनता तय करेगी

केन्द्रीय मंत्री के वी थामस से ख़ास मुलाक़ात

ना तो उनके दफ़्तर में फोन की घंटी का बजना रुक रहा है और ना ही मुबारकबाद और शुक्रिया अदा करने वाले मुलाक़ातियों का आना ।दिल्ली से बहुत दूर केरल की नुमाइंदगी करने वाले प्रोफेसर को यूं तो लंबा वक्त हो गया है राजनीति में लेकिन दिल्ली के पावर कारिडोर में अब उनका जलवा दिखाई दे रहा है ।

 यूपीए चैयरपर्सन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सपने को पूरा करने की चमक और खुशी चेहरे पर साफ दिखाई पड़ती है । कुछ के हिसाब से ऐतिहासिक कदम है फूड सिक्योरिटी बिल तो कुछ इसे वोट गांरटी बिल मानते हैं लेकिन केन्द्रीय खाद्य मंत्री प्रोफेसर के वी थामस के हिसाब से लैट पीपुल डिसाइड ।



सवाल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के ड्रीम प्रोजेक्ट फूड सिक्योरिटी बिल को पास कराने के लिए बहुत मुबारकबाद ,लेकिन कांग्रेस के घोषणापत्र की योजना को लागू करने में भी इतना वक़्त लगा ।
थामस – इस वादे को तो हमें हर हाल में पूरा करना ही था ,वरना आप कहते कि कांग्रेस ने घोषणापत्र में जो कहाउस पर अमल नहीं किया ,और हमनें इस पर पहले दिन से ही काम शुरु कर दिया था ।

 चार जून 2009 को राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में इसका ज़िक्र किया था और अगले दिन पांच जून को तब के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस पर बैठक बुलाई । अलग अलग स्तर पर दर्जनों बैठके हुई। राज्यों के मुख्.यमंत्रियों के साथ फिर वित्त मंत्रालययोजना आयोग नेशनल एडवाइज़री कमेटी सबके साथ सलाह मशविरा किया गया ।

पहला ड्राफ्ट माच 2012 में तैयार हुआ फिर एक साल पहले संसदीय समिति की रिपोर्ट आई ,जिसमें आमतौर पर सभी राजनीतिक दलों की सहमति थी ।उसके बाद कितनी बार तो संसद ही नहीं चल पाई ,लेकिन मैडम का कहना था कि इसे पास करवाना ही है ,क्योंकि वो समझती हैं कि कोई भूखा नहीं रहना चाहिए ।

सवाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली तो पहले से ही चल रही थी ,तो इसमें क्या बड़ा बदलाव किया गया या इसे किस लिहाज़ से ऐतिहासिक माना जाए ।

थामस – पीडीएस और फूड सिक्योरिटी बिल में जो सबसे बड़ा फर्क है वो है गारंटी का कानूनन गारंटी का ,अब ये आपका कानूनन हक़ है और इसलिए हमने कहा कि अब भूख इतिहास बनेगी ।
इस योजना के तहत अब 67 फीसदी लोगों को अनाज मिलेगा और वो भी कानूनी गांरटी के साथ । हर आदमी को पांच किलो अनाज हर महीने इसके साथ ही गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं और बच्चों के लिए खासतौर पर ध्यान रखा गया है ।

 पहले 32 करोड़ लोगों यानी सिर्फ बीपीएल को लिए इसे लागू किया जाना था ,लेकिन अब इसका फायदा 82 करोड़ लोगों को मिलेगा और इसके लिए हमनें पूरी तैयारी कर ली है ।

सवाल जिस दिन आपने फूड सिक्योरिटी बिल पास किया उस दिन ही रुपया लुढ़क गया बाज़ार का हाल देख रहे हैं आप इंडस्ट्री नाराज़ है ।

थामस – ये ठीक है कि बाजा़र की हालत अच्छी नहीं हैं ,रुपया कमज़ोर हुआ है ,लेकिन क्या ये फूड सिक्योरिटी बिल की वज़ह से हुआ है ।बिल तो अध्यादेश के तौर पर दो ढाई महीने पहले लागू हो गया था तब क्या बाज़ार गिर गया था । तो दोनों चीज़ों को अलग अलग तौर पर देखिए । इसका बिल से कोई संबंध नहीं है ।

सवाल लेकिन इंडस्ट्री तो नाराज़ है ,एक तरफ आपके प्रधानमंत्री आर्थिक सुधारों की बात करते हैं तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी अपने सोशल एजेंडा को चला रही हैं क्या दोनों में कोई विरोधाभास नहीं है ।

थामस – कोई विरोधाभास कंट्राडिक्शन नहीं हैं । पीएम हमेशा से ही इकानमिक रिफार्म पर काम कर रहे हैं और मैडम का ज़ोर रहता है समाज के कमज़ोर तबके पर ध्यान देने का ,लेकिन पीएम इसमें उनके साथ हैं ।और इकानामिक रिफोर्म का मतलब ये कतई नहीं होता कि समाज की चिंता नहीं की जाए ।

 वैसे भी पूरी दुनिया में मंदी का दौर चल रहा है ,उसका असर तो हम पर भी पड़ेगा । लेकिन यहां इस बिल से कोई बड़ा आर्थिक भार सरकार पर नहीं पड़ने वाला है ।क्योंकि अभी पीडीएस से अनाज बांटने पर हम लोग करीब 90 हज़ार करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं और फूड सिक्योरिटी बिल के लागू होने से इस पर हर साल एक सौ नौ लाख करोड़ रुपए खर्च आएगा यानी दस हज़ार करोड़ रुपए बढ़ेंगें वो इतनी बड़ी रकम नहीं हैउसे मैनेज किया जा सकता है ।

 फिर हमनें पीडीएस सिस्टम को सुधारने के लिए पांइट फार्मूला बनाया है उससे भी हालत सुधरेगी ।

सवाल बीजेपी के डा़ मुरली मनोहर जोशी ने आपके बिल को फूड सिक्योरिटी के बजाय वोट सिक्योरिटी बिल कहा है यानी सिर्फ वोटों की चिंता के लिए आपने इसे लागू किया ।

थामस – जम्हूरियत में हर किसी को अपनी बात अपने तरह से कहने का हक़ है ,लेकिन इस बिल का संबंध वोटों से नहीं हैं । इस योजना का ज़िक्र तो हमनें 2009 के चुनावी घोषणा पत्र में किया हैउसे पूरा करना तो हमारी ज़िम्मेदारी है और आप इसे जनता को तय करने दीजिए कि वो क्या सोचती है लैट पीपुल डिसाइड ।क्या हमनें 2009 में तय कर लिया था कि ये योजना हम 2013 में लाएंगें और इसका फायदा चुनावों में होगा ।

 पिछली बार हम नरेगा योजना लाए थे ,लोगों को मज़दूरी का अधिकार दिया था और इस बार भोजन का अधिकार दिया है । यूपीए सरकार योजनाओं से आगे बढ़कर अब अधिकार के ट्रैक पर चल रही है हमनें सूचना का अधिकार दियाशिक्षाका अधिकार दिया मज़दूरी का अधिकार दिया और भोजन का अधिकार दिया ,सब कानूनी अधिकार हैं और इन सबसे मुल्क की तस्वीर बदल रही है ।

सवाल माफ कीजिएमुझे ये पालिटिकल इनसिक्योरिटी बिल लगता है ।यानी अभी यूपीए सरकार खुद को इतना पालिटिकल इनसिक्योर महसूस कर रही है तो उससे बचने के लिए ऐसे आर्थिक हालात में भी आप ये बिल लेकर आए ।

थामस – मैंने कहा ना आपको लैट पीपल डिसाइड । चुनाव आने वाले हैं ,तो लोग खुद फैसला करेंगे कि हमनें किसलिए ये योजना लागू की है ।क्या इसमें कोई खराबी लगती है आपको कि लोगों को भोजन की गारंटी मिले ।


 इस देश में कोई आदमी भूखा ना सोए और यदि उसके लिए पैसे की ज़रुरत है तो ये देखना सरकार काम है । उसको इंतज़ाम करना होगा । मैडम सोनिया गांधी ने भी कहा कि सबसे ज़रुरी है भूखे आदमी के लिए रोटी का इंतज़ाम करना .इसके लिए सरकार को जो ज़रुरी लगे वो करे ।और फिर इस पर ज़्यादा पैसा खर्च नहीं हो रहा इसका बहुत बड़ा हिस्सा तो अभी पीडीएस में चल रहा है ,मैंने आपको बताया ।

सवालएक तरफ आप कहते हैं कि ये ऐतिहासिक बिल है ,दूसरी तरफ इसे पीडीएस का एक्सटेंशन जैसा बताते हैं तो क्या माना जाए क्या इसे मैं लैंग्वेज़ जगलरी यानी सिर्फ लफ्फाज़ी कह सकते हैं  ।

थामस – लैंग्वेज जगलरी नहीं हैं इट्स हिस्टोरिकल इन द सेंस कि इट गिव्ज़ गारंटी पार फूडये बड़ा फ़र्क है पीडीएस और इसमें । अब कोई भी आदमी इसके लिए कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटा सकता है । देखिए ये कोई नहीं बात नहीं है किसी भी योजना को क्रिटीसाइज़ करना ।

 आज़ादी के
बाद जब पंडित नेहरु ने पंचवर्षीय योजना और सरकारी कंपनिया शुरु की तब लेफ्ट ने उसे स्टारवेशन प्लान कहा था इंदिरा गांधी जी ने जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और आर्यभट्ट छोड़ा तो उनकी भी बहुत आलोचना हुई ,हमारे राइटविंग के साथियों ने उस इकानमिक सिस्टम पर सवाल खड़े किए और आर्यभट्ट को लेकर कहा कि जब लोग भूखे मर रहे हैं तब सैटेलाइट छोड़ने की क्या ज़रुरत है लेकिन उससे जो खेती में ऐतिहासिक तब्दीली आई वो सबके सामने हैं ।
फिर राजीव जी के पंचायती राज और टेलीकाम सैक्टर पर फैसलों को लेकर भी काफी आलोचना हुई था आज क्या टेलीकाम और कम्प्यूटर के बिना इतनी तेज़ी हमारी विकास की रफ्तार में आ सकती थी । तो आलोचना करना क्रिटीसाइज करना डेमोक्रेसी में सबका अधिकार है लेकिन फैसला जनता को करना होता है ।

सवाल आप इसका प्रैक्टिल आस्पेक्ट देखिएखुद आपके कृषि मंत्री शरद पवार इस बिल के साथ नहीं दिखतेउन्होंने कहा कि खेती की पैदावार पर भरोसा नहीं किया जा सकता और हमारे पास अनाज रखने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं हैं ।

थामस – मैं पवार साहब से सहमत हूं कि खेती की पैदावार पर भरोसा नहीं किया जा सकता ,लेकिन हमने प्रोडक्शन के प्रोजेक्शन देखे हैं । चावल की पैदावार 104 मिलियन टन और उसकी भंडारण 34.5 मिलियन टन है जबकि गेहू की पैदावार 81.61 मिलियन टन और भंडारण 26.37 मिलियन टन है ।यानी कुल पैदावार करीब 185 मिलियन टन और भंडारण 60 मिलियन टन है और हमें 62 मिलियन टन अनाज हर साल चाहिए और हमारी भंडारण क्षमता अगले पांच साल में बढ़कर करीब 85 मिलियन टन हो जाएगी तो मैं समझता हूं कि इसके लिए परेशान होने की ज़रुरत नहीं है ।

सवाल कई राज्यों में ये योजना पहले से चल रही है छत्तीसगढ़ में हैराजस्थानकेरल ,तमिलनाडपंजाब और मध्यप्रदेश में है । छत्तीसगढ़ की योजना सबसे अच्छी बताई जाती है वैसे क्यों नहीं किया आपने ।

थामसछत्तीसगढ़ की योजना अगर सबसे अच्छी है तो फिर बीजेपी ने मध्यप्रदेश और अपनी सरकारों वाले दूसरे राज्यों में इसे क्यों नहीं शुरु किया । दूसरी बात जब हमनें इस बिल का ड्राप्ट तैयार किया था उसके बाद छत्तीसगढ़ में योजना शुरु हुई ,इसलिए ये दावा करना भी ठीक नहीं है कि वहां सबसे पहले शुरु हुई । सब जगह की अलग अलग जरुरतें होती हैं तो उस हिसाब से उसे वहां लागू किया जा सकता ।

सवाल लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह तो आपकी योजना को लागू करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि आप दो रुपए किलो गैंहू दे रहे हैं वो सिर्फ एक रुपए किलो दे रहे हैं ।
थामस – तमिलनाड में तो मु्फ्त अनाज दिया जा रहा है तो ये सब राज्य सरकारों को अपने अपने हिसाब से सोचना है ,लेकिन हकीकत क्या है कि वो अनाज तो हमारा ही है हम उस अनाज पर 20 रुपए की सब्सिडी दे रहे हैं और वो उसी अनाज पर दो रुपए की सब्सिडी देकर बेच रहे हैं अपनी वाहवाही लेकर । हम अपने हिसाब से अनाज दे रहे हैं , 82 करोड़ लोगों को दे रहे हैं ।
 आख़िरी सवाल ये आपकी ऐतिहासिक योजना इलेक्शन बूथ तक कैसे पहुंचेगी कितना वक़्त लगेगा अभी इसमें ।
थामसमैंने आपको कहा कि इस योजना को वोट से कोई लेना देना नहीं हैं । इसे हर आदमी तक पहुंचने में मुझे लगता है करीब साल भर लग जाएगा ,लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है चुनाव के बाद भले ही कोई भी सरकार आएवो अब इसे बंद नहीं कर सकती जो गरीब आदमी के लिए सबसे ज़रुरी चीज़ है ।
समाप्त विजय त्रिवेदी ,
सहयोगी -प्रतिभा ज्योति ,
फोटो गणेश बिष्ट 
सौजन्य- राजस्थान पत्रिका

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