Monday, August 12, 2013

xclusive intv wd Vinod Rai ,fmc CAG,उस रात चीफ सेक्रेटरी ने


विजय त्रिवेदी

पूर्व सीएजी विनोद राय के साथ ख़ास मुलाक़ात

उस रात चीफ सेक्रेटरी ने मना कर दिया होता तो ....

चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहटधीमीमीठी लेकिन ताकतवर आवाज़ अब तक सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते रहे अब हर सवाल का जवाब देने को तैयार ।कई बार सवालों के जवाब में भी सवाल । 

आजकल देश भर के अलग अलग शहरों में व्याख्यान देने में लगे ताकि मुल्क में नौजवान पीढ़ी को ताकत मिल सके हिम्मत मिल सके और असल में सही रास्ता मिल सके ,लेकिन खुद को जेहादी ,आंदोलनकारी या फिर हीरो मानने को तैयार नहीं ।सरकार के कुछ लोगों की नज़र में मुनीम रहे पूर्व सीएजी विनोद राय ने अपनी रिपोर्ट से सरकार के कई मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया ।



सवाल सीएजी रहते हुए आपने जिस तरह से सरकारी भ्रष्टाचार को सामने लाने की हिम्मत दिखाई उसके बाद से बहुत से लोग आपको हीरो के तौर पर देखते हैं तो बहुत से क्रूसेडर यानी जेहादी के तौर पर ।
विनोद राय – मैं खुद को क्रूसेडर या आंदोलनकारी नहीं मानता क्योंकि क्रूसेडर वो होता है जो जनता के साथ सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़े या प्रदर्शन करे । सीएजी की भूमिका में मैंने सरकार के कामकाज में हुई अनियमितताओं को सामने रखने का काम किया है और हम सिर्फ आडिट करते हैं जांच नहीं करते ।

 उस रिपोर्ट पर सीवीसी उसे सीबीआई के पास भेजते हैं तो मैं समझता हूं जो मुझे सरकार से मेंडेट यानी भूमिका मिली थी उसे मैंने गंभीरता से निभाने और पूरा करने की कोशिश की और मीडिया का उसमें बहुत पाजिटिव सहयोग मिला ।

सवाल आपने मेंडेट की बात की ,सरकार में दरअसल किसके पास मेडेंट होता है ,अफसर के पास या फिर मंत्री के पास ।
विनोद राय – हम संसदीय जनतंत्र को मानते हैं और उसमें जनादेश यानी मेडेंट मंत्री के पास होता है और अफसर या सेक्रेटरी एक तरह से एक्जीक्यूटिव हैड होता है यानी मंत्री सुप्रीम होता है फैसला मंत्री को करना होता है 

कई बार सेक्रेटरी अपनी राय भी रखता है लेकिन उस पर सहमत होना या ना होना मंत्री पर निर्भर करता है और आखिरी बात मंत्री की ही होती है ।

सवाल आप पालिटिकल सुप्रीमेसीकी बात कर रहे हैं ज़्यादातर लोग उसे पालिटिकल मास्टर्स कहते हैं ।
विनोद राय – हमारे पालिटिकल माडल में पालिटिकल सु्प्रीमेसी की बात है और उसमें बहुत से लीडर मेच्योर हैं जो सब बातों को समझते हैं ,लेकिन जो मेच्योर लीडर नहीं हैं वो खुद को मास्टर्स समझते हैं और उस तरह बर्ताव करने लगते हैं ।

 वे नुमाइंदे होते हैं हमारे सिस्टम में उन्हें पब्लिक सर्वेंट यानी जन सेवक कहा गया है मास्टर्स नहीं । वैसे छोटे स्तर पर यानी कस्बेविधानसभा और ज़िला स्तर पर छोटे राजनेता अपना दबदबा बनाए रखने के लिए इस तरह का बर्ताव करते हैं ।

सवाल अभी का किस्सा लीजिए यूपी की आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति का जिस तरह उन्हें सस्पेंड किया गया किसकी गलती मानेंगें आप ।
विनोद राय उस मामले में मैं अपनी बिरादरी की गलती मानता हूं ।आईएएस अफसर को ऐसे ही स्सपेंड नहीं किया जा सकता । यदि वहां के चीफ सेक्रेटरी उस रात को साढ़े दस बजे दस्तखत नहीं करते तो ये नहीं हो पाता । उनको कहना चाहिए था कि मैं सवेरे डीएम की रिपोर्ट मंगा कर पूरी जानकारी दूंगा और तब फैसला कीजिएगा ।

 मैं नहीं समझता कि यदि चीफ सेक्रटरी मना कर देते तो किसी चीफ मिनिस्टर या मंत्री की हिम्मत होती ,उन पर दबाव डालने की और यदि उसके बाद भी कहते तो साफ हो जाता कि किसकी वज़ह से सस्पेंड किया गय़ा ।

सवाल यानी आप चीफ सेक्रेटरी को ज़िम्मेदार मानते हैं या उन्हें कमज़ोर समझते हैं ।
विनोद राय – मेरा कहना है कि किसी क्षण मूमेंट पर कोई कमज़ोर हो जाता है तो चूक हो जाती है । उस वक्त उसकी हिम्मत की ज़रुरत होती है और ये सिर्फ एक प्रशासकीय फैसला भर नहीं है ,

इससे एक मैसेज जाता है नए अफसरों में कि पालिटकल लीडर ही सुप्रीम है और उससे अटकने की ज़रुरत नहीं जो अच्छी बात नहीं है ।

सवाल इसका मतलब मुझे ये समझ आता है कि आपने जो कोलगेट, 2 जी और कामनवेल्थ पर रिपोर्ट दी और उसमें गड़बड़ियां सामने आई,उसके ज़िम्मेदार दरअसल सेक्रेटरी या अफसर हैं ।
विनोद राय – ऐसा नहीं है । जी मामले को लीजिए। उसमें तत्कालीन सेक्रेटरी ने फाइल को 31 दिसंबर 2007 तक रोका था । फिर एक जनवरी को नए सचिव आए और दस जनवरी को सरकार ने लाइसेंस बांट दिए । शायद तब तक नए सेक्रेटरी को मामले की पूरी जानकारी नहीं रही होगी ।

 सेक्रेटरी चाहे तो फाइल को रोक सकता है अपनी राय लिख सकता है और उसके बाद भी यदि मंत्री कोई फैसला ले तो वो अपनी राय कैबिनेट सचिव को बता सकता है और कैबिनेट सचिव प्रधानमंत्री को । और मैं समझता हूं कि ब्यूरोक्रेसी में ज़्यादातर अफसर उसी ईमानदारी के साथ काम करते है ।

 कोयला आंवटन मामले में भी करीब करीब ऐसा ही हुआ ता और जब पीएम के पास कुछ वक्त के लिए कोयला मंत्रालय था तब उन्होंने अपनी राय में नीलामी के बारे में कहा था ,लेकिन उसके बाद भी सरकार ने स्क्रीनिंग कमेटी के रास्ते ही फैसला किया ।

सवाल आपने पीएम का बतौर कोयला मंत्री ज़िक्र किया सवाल ये है कि आपने कोयला घोटाले के मामले में पीएम को क्यों छोड़ दिया जबकि वो भी संबंधित मंत्री रहे हैं ।
विनोद रायसवाल पीएम को छोड़ने का नहीं है । उस दौरान कई बार कोयला मंत्रालय में मंत्री बदले गए और कुछ कुछ वक्त के लिए उस दौरान मंत्रालय पीएम के पास रहा और मैंने बताया आपको कि तब पीएम ने फैसला लिया था कि कोयला आवंटन स्क्रीनिंग कमेटी के रास्ते नहीं हो ।
 लेकिन सरकार ने फैसले को नहीं बदला और हो सकता है कि पीएम को बाद में लगा हो कि वही फैसला चल रहा है जो उन्होंने किया था ।

सवाल आप पीएम को बचाने की कोशिश कर रहे हैं यदि पीएम के पास इतनी फुर्सत नहीं होती है तो ज़रुरत है क्या मंत्रालयों को अपने पास रखने की ।
विनोद राय – इसे मैं नेगलिजियेंस नहीं ओवरसाइट कहूंगा ।

सवाल कोयला घोटाले और जी के बाद सत्तारुढ़ दल यानी कांग्रेस की तरफ से आप पर कई तरह के निशाने लगाए गए ,किसी ने आपको सरकार का मुनीम भर बताया तो किसी ने कहा कि आपकी पालिटिकल एस्पिरेशन्स हैं निजि छवि पर हमला किया गया कैसा लगता है आपको ।
विनोद राय – देकिए आडिटर का काम है गल्तियां निकालना गड़बड़ियों को सामने रखना । अब जिसके खिलाफ अनियमितता होती है तो वो कुछ ना कुछ आरोप तो लगाता ही है ये आम बात है ,लेकिन निजी तौर पर हमला नहीं करना चाहिए । अब यदि सीएजी सरकार का मुनीम है तो फिर उसके पास इतनी ताकत और अधिकार क्यों दिए हैं आपने ।

 सीएजी को लोकलेखा समिति के अध्यक्ष से मिलना होता उसे रिपोर्ट करना होता है और पीएसी की अध्यक्ष विपक्षी पार्टी से होता है तो ये तो मेरी ड्यूटी है उनसे मिलना और उन्हें रिपोर्ट करना .और कोई चोरी छिपे मिलने नहीं गया बाकायदा वक्त लेकर सरकारी गाड़ी से जाता रहा ।अब आप इसके लिए जो भी मतलब निकालिए ।

 वकीलों के लिए कहा जाता है कि अगर आपके पास फैक्ट्स स्ट्रांग हो तो कोर्ट में बैंग द फैक्ट्स और फैक्ट्स कमज़ोर हो तो बैंग द टेबल तो बहुत से लोग बैंग द टेबल कर रहे थे ।

सवाल कहीं इसकी वज़ह ये तो नहीं कि आपने जो रकम बताई थी घोटाले की लाख 76 हज़ार करोड़ ,वो इतनी बड़ी थी कि उससे सरकार के खिलाफ ऐसा माहौल बना कि लगा बहुत बड़ा घोटाला हो गया और सरकार दबाव में आ गई ।
विनोद राय – मैं कहता है कि गड़बड़ी हुई इसको लेकर तो कोई सवाल या आपत्ति नहीं है ,थोड़ा विवाद क्वांटम यानी कितनी बड़ी रकम है ,उसको लेकर हुआ । सीबीआई ने भी तीस हज़ार करोड़ का ज़िक्र किया ,तो उस पर बहस हो सकती है और यदि वो रकम गलत है तो फिर ज़ीरी लोस थ्योरी भी तो ठीक नहीं कही जा सकती ।

 मंत्री का इस्तीफा तो हमारी रिपोर्ट आने से पहले हो गया था तो इसका क्या मतलब है यानी कुछ लोगों को समझ में आ गया था कि कहां और क्या गड़बड़ी हुई है ।

सवाल प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री नारायणसामी ने कहा था कि सीएजी को सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं आपने फिर कोल आवंटन की नीति पर टिप्पणी क्यों की ।
विनोद राय – बिलकुल ठीक कहा था उन्होंने । सीएजी कभी सरकार की नीतियों पर टिप्पणी नहीं करता क्योंकि ये अधिकार उनके पास नहीं है । सीएजी का काम है कि सरकार की जो नीतियां हैं उसके मुताबिक काम हुआ है या नहीं और यदि नहीं हुआ है तो क्या गड़बड़ी हुई उसे सामने लाना उनका काम है .

कोल आवंटन मामले में हमने कहा कि जब 2004 में सरकार ने फैसला कर लिया कि कोल आवंटन स्क्रीनिंग कमेटी के रास्ते से नहीं किया जाना चाहिए तो फिर क्यों सरकार 2010 तक ये करती रही और 2010 में बिल पास करने के बाद भी अभी तक 2013 तक क्या हो रहा है और यदि कोयले की इतनी ज़रुरत थी तो जिन 57 माइन्स को काम दिया गया उनमें से कितने ने कोयला निकालना शुरु कर दिया इन सब सवालों के जवाब तो चाहिए ना ।

सवाल अभी नए सीएजी की नियुक्ति पर भी विवाद हुआविपक्ष के नेता ने सवाल उठाया क्या आपको लगता है कि सीएजी की नियुक्ति के लिए कोई नया तरीका या रास्ता इस्तेमाल करना चाहिए ।

विनोद राय मुझे लगता है कि अभी जो नियेुक्ति का तरीका है ,वो भी अच्छा है और उसमें कोई खराबी नहीं हैं ,लेकिन सीवीसी की तरह कालेजियम बना कर नियुक्ति की जाए तो और ज़्यादा बेहतर होगा क्योंकि उससे पारदर्शिता बढ़ेगी और कोई तब सवाल नहीं कर पाएगा ,

 मैं समझता हूं कि यदि उस तरह से भी नियुक्ति होती तब भी मौजूदी सीएजी ही नियु्कत होते क्योंकि वे एक बेहतर अफसर हैं ।

सवाल कुछ लोग सीएजी के स्वरुप को बदलने की बात भी करते रहते हैं कि क्यों ना इसे मल्टी मैम्बर बना दिया जाए ।

विनोद राय – हां इस पर अलग अलग तरह की राय सामने आई है । इस मसले पर जब पीएमओ ने मुझसे राय मांगी थी तो मैंने अलग अलग मुल्कों में सीएजी के लिए चलने वाले सिस्टम का ज़िक्र किया था ।

 जैसे फ्रांस में कोर्ट और आडिटर्स होता है ,उसमें वे कोर्ट की तरह काम करते हैं और उन्हें सज़ा देने का अधिकार भी होता है ।

 जापान में कमीशन आफ आडिटर्स होते हैं ,उनके पास भी ज़्यादा ताकत होती है । कामनवेल्थ मुल्कों में हमारी तरह सिंगल मैम्बर सीएजी होता है । ज़्यादा सदस्य होने से और बेहतर होगा और ज़्यादा ट्रांसपेरेंसी आएगी ।

सवाल आप इसको छोटी बात समझ रहे हैं शायद,पिछला इतिहास देखिए – बोफोर्स पर सीएजी की रिपोर्ट से राजीव गांधी की सरकार चली गई । चारा घोटाले पर सीएजी रिपोर्ट के बाद से लालू याद फिर से अभी तक बिहार में सरकार नहीं बना पाए । करगिल और ताबूत घोटाले की रिपोर्ट का राजनीतिक नुकसान एनडीए सरकार को उठाना पड़ा ।

विनोद राय – सरकारों के जाने आने के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता और सरकारें किसी रिपोर्ट पर जाती होंऐसा मुझे नहीं लगता ,अलबत्ता कुछ मंत्रियों को ज़रुर कुर्सी छोड़नी पड़ी । कुछ लोगों को जेल जाना पड़ा तो ये अच्छी बात है कि सरकार पर रिपोर्ट का असर हो रहा है ।

सवाल बोफोर्स पर रिपोर्ट तब के सीएजी त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी जी ने दी थी वे बाद में गवर्नर भी बने और सांसद भी तो ऐसा कैसे मान लें कि आपके सुर्खाब के पंख लगे हैं और आप किसी हाल में राजनीति में नहीं जाएंगे ।
विनोद राय – बिलकुल ठीक कहा आपने मेरे कोई सुर्खाब के पंख नहीं लगे । चतुर्वेदी जी के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है ,लेकिन पहली बात तो ये कि राजनीति में जाना कोई अपराध नहीं है ।
सवाल आप सारी गड़बड़ी की ज़ड़ राजनेताओं को मानते हैं अफसरों यानी अपनी बिरादरी को बचा रहे हैं ।
विनोद राय – नहींऐसा नहीं हैंदरअसल गड़बड़ी की वज़ह है राजनीति में पैसे की बढ़ती ताकत यानी मनी पावर । उसके कारण हर कोई ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाना चाहता है और वहां से गड़बड़ शुरु होती है । 

 इसमें अफसर और राजनेता दोनों जब मिल जाते हैं तब घोटाले शुरु होते हैं वरना हमारे सिस्टम में इतने चैक्स एंड बैलेंसेज हैं कि एक दूसरे को रोका जा सकता है ।

 आखिरी सवाल सीएजी रहते हुए आपने इतने प्रवचन दे दिए तो दूसरे को प्रवचन तो हर कोई दे सकता है आप खुद आइए राजनीति में ,फिर दिखाइए कि कैसे ईमानदारी से काम हो सकता है ।
विनोद राय आप ठीक कह रहे हैं कि प्रवचन देना आसान काम है लेकिन मैंने कहा कि मैंने सोचा ही नहीं राजनीति में जाने के बारे में और मैं ज़िंदगी भर अपालिटिकल मैन रहा हूं । 

मैं समझता हूं कि पालिटिक्स इज नाट माई कप आफ टी । और पालिटिक्स के अलावा भी बहुत से रास्ते हैं जिन पर काम किया जा सकता है और मैं कोशिश कर रहा हूं कि मैं उन पर काम करुं ।
समाप्त विजय त्रिवेदी
फोटो -गणेश बिष्ट

सौजन्य- राजस्थान पत्रिका 

1 comment:

  1. Vinod Rai ji mukhar andaz....or Vijay ji ke akramak sawal...

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