Friday, August 2, 2013

xclsv wd krishna sobti-दूसरों का बीज पाप ?


विजय त्रिवेदी
लेखिका कृष्णा सोबती से विशेष मुलाकात

औरत मर्दों की साज़िश का शिकार ना बने
चेहरे पर नूर, आंखों में चमक और होठों पर खनखनाती सी हंसी
,बातचीत में स्वर नहीं है, झरना बहने लगता है कलकल करता सा ,इतिहास के पहाड़ों से उतरती स्मृतियां कैसे वर्तमान में नदी की तरह पिघल कर कब भविष्य के समुंदर में मिल जाती हैं ,एहसास ही नहीं होता ।

 शब्द सिर्फ वाक्य विन्यास के औज़ार नहीं लगते ,ज़िंदगी को श्रृंगारित करते आभूषण बन जाते हैं । शब्दों को हर बार नये मायने
देने का नाम है -कृष्णा सोबती । कैलेंडर को झुठलाती 87 साल की कृष्णा ।

 खूबसूरत सी काली  टोपी सिर पर रखी तो केसर घुला चेहरा और दमकने लगा । लंबे बड़े बड़े मग जैसे कपों में रखी गर्मा गर्म चाय , टेबल पर रखी काजू की बर्फी, केक और बिस्किट्स ,लेकिन किसी चीज़ की ज़रुरत ही नहीं , बातों की गर्माहट …..

सवाल - पूरा माहौल अंग्रेज़ीमय, अंग्रेजी दा लोग, अंग्रेज़ी के लेखक और हिंदी सिनेमा में नाम और शोहरत कमाते अंग्रेज़ी में चिंतन करते लेखक, सेलेब्रिटी,कहां हैं हिंदी और क्यों नहीं है ।

सोबती जी- (हंसी....) हिंदी वाले लोग, खुद को ही निरीह बना कर रखते हैं । मानते हैं कि हिंदी का लेखक निरीह है । थोड़ी सी कोशिश करने की ज़रुरत है ,नहीं करते । हिंदी या भाषाई लेखकों का मुकाबला नहीं है अंग्रेज़ी से ।

 भाषाई और हिंदी के लेखक बहुत करीब हैं गांव से, कस्बे से , मिट्टी से ,संस्कृति से , मानों उनमें ही घुले मिले हुए ,उसी में से निकले हुए,अंग्रेजी वाले वहीं तक सोच भी नहीं सकते । एक बड़ी दुनिया है हिंदी से जुड़ी हुई ।आपको हिम्मत करनी पड़ेगी ।

 स्वाभिमान को जगाने की ज़रुरत है । सरकार के पीछे भाग रहे हैं ,जिनसे दूर रहना चाहिए । मैं अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हूं ,लेकिन हिंदी को अपनी जगह खुद बनानी पड़ेगी ।

सवाल - तो क्या हिंदी के लेखकों में स्वाभिमान नहीं हैं, क्या को कोई डर सा समाया रहता है ,क्या आप लड़ती हैं ।
सोबती जी - मैं कार्यक्रमों में लिख कर पढ़ती हूं , फोकस करके , कितना कहना है , क्या कहना है सब कुछ । एक बार किसी बड़े कार्यक्रम में बुलाया गया , मैंने अपना भाषण तैयार किया ।

आयोजकों ने कहा आधा घंटे का वक्त आपके लिए है बोलने के लिए, मैंने बताया कि 18 मिनट बोलूंगी ,लेकिन जब बोलने की बारी आई तो मंच पर बैठे अध्यक्ष जी ने कहा कि आपको सिर्फ दस मिनट मिल पाएंगे

, मैंने कहा कि मैंने पहले ही बता दिया था कि 18 मिनट चाहिए. मैंने मना कर दिया , कहा कि नहीं बोलना ,फिर आयोजक मनाने लगे , विनती करने लगे , मैंने मना कर दिया , स्वाभिमान भी तो कुछ होता है ,लेकिन हम हिंदी वाले ….
सवाल  - लेखन तो आजकल बहुत हो रहा है , हर विषय पर , हर रंग में लेकिन असल मायने क्या है लेखक के , शब्दों की कुकिंग रेसीपी ,शब्दों को व्याकरण के साथ गूंथकर जोड़ना भर ।

सोबती जी - लेखक व्यक्ति की , नागरिक समाज की , देश और काल की आहटों को सुनता है , अगले पिछले की तलाश करता है , वक्त का जायज़ा लेता है ,फिर सृजन के स्तर पर उसे रचना में अंकित करता है । देश काल की स्थितियों को अपने में जज़्ब करता है और पत्रों पर उतारने की संभावनाओं को फलीभूत करता है ।

 लेखक सिर्फ अपने निज की लड़ाई नहीं लड़ता , न केवल अपने दुख दर्द विषाद का लेखा जोखा ही प्रस्तुत करता है । वह अपने साहित्य व संस्कारी सरोकारों से उन सबकों खोजता है जो सीमाओं से जकड़ी पीढ़ी दर पीढ़ी संघर्ष करते हैं और एक बेहतर ज़िंदगी के बाहर खड़े खड़े ही शेष हो जाते हैं ।

सवाल - तो लेखक का धर्म क्या है कलात्मक सृजन या सत्य की खोज करना , संवेदना की कुंलाच भरती हुई अनुभति ।

सोबती जी - लेखक का रचना कर्म और धर्म दोनों अंदर बाहर, व्यक्ति और समाज के सत्ता व्यवस्था प्रशासन के दबावी तनावों से उभरे संकीर्ण संकट और विद्रूपों की जांचना पड़तालना भी है । चिंतन विचार साहित्य की आत्मा है तो भाषा उसकी देह है ।

 भाषा की जड़ों को हरा करने वाला रसायन लोकमानस है जो नित नित इसे हरियाता है । किसी भी रचना में अगर अनुभूति संवेदन और बिना पूर्वाग्रह जीवन को समझने और महसूस करने के आग्रह नहीं हैं तो ऐसे में कोई जीवंत रचना उभारी नहीं जा सकती । सत्य की खोज और मूल्यों की शनाख्त ही अच्छी कृति की पहली पहचान है ।


 जीवन और साहित्य कला बंटे हुए नहीं हैं । वह सांझेपन में ही एक दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं । जीवन के किसी छोटे बड़े टुकड़े को , स्थिति को, घटना को सिर्फ कलात्मक क्षमता से , शिल्प से प्रस्तुत भर कर देने से कालजयी साहित्य नहीं गढ़ा जा सकता । साहित्य को तो उगना होता है रचनाकार की आत्मा में ।


सवाल - किसी रचना के चरित्र क्या किसी लेखक की सोच से पैदा होते हैं , क्या उसके आग्रह और पूर्वाग्रह किसी चरित्र को नया स्वरुप नहीं देते ।

सोबती जी - मैं अपने चरित्रों को टेबल पर इतने दूर रखती हूं कि वो मुझ जैसे नहीं हो जाते और इतना करीब भी रखती हूं कि वो संवेदनाओं को महसूस कर सकते हैं ।लेखक की तटस्थ निसंगता या उसके अवचेतन का गहरा रसाव जब अनुभूति को लिखने के करीब लाता है तो जिया हुआ अनुभव मथकर उसकी दृष्टि को एक साथ निखार और तराश देता है । 

अगर ऐसा नहीं होता तो लेखक के अपने आग्रह ,मूल्य और सत्य बन जाने की उतावली में आधा सच और आधा झूठ बन कर रह जाते । लेखक अपनी धारणाओं के अनुरुप ही रचना की बनावट और बुनावट बुनने लगता है ।

 एक खास दृष्टिकोण से चीज़ों को देखने या ज़िंदगी को पढ़ते रहने से लेखक की ईमानदारी में हेरफेर होने लगते हैं । ये रद्दो बदल जब बुनियादी सोच पर हावी हो जाते हैं , तो कम खतरनाक साबित नहीं होते ।

सवाल- आपका लेखन औरत की तस्वीर को साफ साफ दिखाता है ,लेकिन फिर भी उसे फेमिनिस्ट लेखन नहीं माना जाता । जब मित्रो मरजानी में मित्रो आखिर में घर लौटना ही कबूलती है तो महिला लेखकों को इस पर ऐतराज़ होता है ।

सोबती जी - चरित्रों को जीने का मतलब , लिखने का मतलब उनके साथ सच बोलना होता है ,उसमें समय और स्थितियां भी अहम होती है । मैं ने कोशिश की है कि औरत को औरत की तरह समझ सके । 

ज़िंदगीनामा में बहुत से चरित्र हैं ,सब अलग अलग तरह से जीते हैं , मित्रो का अलग स्वभाव और रंग है तो पाशो और रत्ती भी बिलकुल अलग अलग चरित्र हैं , असलग अलग वक्त और परिस्थितियों में रचे गये और जिए गए ।


 लेखक अपने आप में किसी विशिष्ट ईकाई का प्रतीक नहीं । वह दूसरों के होने से लेखक है । सच तो ये है कि कलाकार को , लेखक को , हर यात्रा में ,टुकड़ों और समग्रता में ,अंदर और बाहर के अधूरेपन और समूचेपम में बार बार लौट कर आना होता है । शायद इसी इम्तिहान के लिए लेखक, लेखक है ।

 नश्वरता का गहरा दर्द जो इंसान की धमनियों मे बराबर बहता आया है , और एक दूसरा जो हमारे बाहर यहां वहां - सब कहीं बिखरा है - लेखक इन दोनों में से किसी एक से परिचय घटा बढ़ा सकता है , पर यकीनन किसी एक पर आंखें मीच कर उसे अपनी चेतना से गायब नहीं कर सकता ।

सवाल - लेकिन जब एक तरफ मित्रो कहती है कि -जिंद जान का ये कैसा व्यापार, अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म और दूसरी तरफ उसकी सास कहती है कि - नित नित जूठी होती औरत की देह निरा पाप का घाट है , आप किसे मानती हैं ,मित्रो की बात बानें तो सामाजिक अराजकता नहीं हो जाएगी ।
सोबती जी - देखिए , दोनों में घटनाक्रम तो एक ही है ,फिर सवाल उठाया जा सकता है कि क्या और क्यों कोई एक ही चीज़ एक बार पुण्य है तो कभी पाप । लेकिन ये उस ज़माने की बात है अब तो वक्त बहुत बदल गया है , सोच में भी काफी कुछ बदलाव आया है ।

आज की पीढ़ी के लेखक नए तरीके से सोचने समझने लगे हैं । सास जो बोल रही है वो भी ज़माने का सच है , समाज उसी तरह महसूस करता है ।

सवाल - सामाजिक व्यवस्था में विवाह जैसी संस्था की ताकत क्या कमज़ोर हो रही है , क्या आप इसे मानती हैं या लिव इन रिलेशनशिप जैसा सिस्टम ठीक है ।

सोबती जी - विवाह और परिवारों में भी बहुत बदलाव आया है । अब मर्द घर के कामकाज में हिस्सेदार होने लगे हैं और इसकी बड़ी वज़ह है औरत की आर्थिक आज़ादी । औरत अब पूरी तरह से पैसे के लिए मर्द पर निर्भर नहीं हैं ।

 वो खुद काम कर रही है , कमा रही है , इससे उसकी आज़ादी और ताकत दोनों बढ़ी है , इसलिए मैं बार बार कहती हूं कि उसे मर्दों की उस सोच या साज़िश का शिकार मत बनने दो कि औरत सिर्फ रसोई और बिस्तर के लिए होती है , उस सोच से आगे निकलने के लिए, उस बंधन को तोड़ने के लिए औरत को आर्थिक रुप से आज़ाद होना ही चाहिए ।

सवाल - जावेद अख्तर साहब ने कहा कि किसी भी धर्म में औरत को बराबरी का हक नहीं मिला , कमोबेश यही बात महाश्वेता देवीजी और शर्मिला टैगोर ने भी कही , क्या आप भी धर्म को ही औरत की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार मानती हैं ।
सोबती जी - धर्म को ज़िम्मेदार मानने की बात नहीं हैं , धर्म के बहाने , सामाजिक बंधनों के बहाने औरत को बांधने की कोशिश हमेशा ही होती रही है और वो हर धर्म में होती रही है ,सारी संस्कृति स्त्री की नोचानाची करते हैं । हरेक के अपने बहाने हैं ,लेकिन अब आगे निकलने की ज़रुरत है , आगे बढ़ने की ज़रुरत है ।

बातों का सिलसिला खत्म करने का मन नहीं करता ,क्योंकि उसे झरने ने दिमाग से दिल तक सबको तरोताज़ा कर दिया है ,और हंसी ,उनकी खनखनाती हंसी तो ज़िंदगी और उम्र दोनों को नए मायने देती लगती है, फिर से गर्म चाय आ गई हैं , अपने पास से एक फोटो निकालती हैं , बेहद खूबसूरत फोटो, बैंगनी से रंग के फिरन जैसे सूट में , धूप के चश्मे से झांकती बोलती आंखें और टेबल पर रखी खुली किताब बिल्कुल उनकी ज़िंदगी की तरह , हर कोई पढ़ सके ताकि जीना सीखा जा सके ।

समाप्त , विजय त्रिवेदी

सौजन्य- राजस्थान पत्रिका 

1 comment:

  1. So meaningful interview. Its really useful for those who are doing research on Krishna ji's books. Question are also well and language is too creative.

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