Saturday, August 17, 2013

no language for love


विजय त्रिवेदी

शाहरुख़ ख़ान से ख़ास मुलाक़ात

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प्यार की कोई भाषा नहीं होती 

सबसे तेज़ रफ्तार से 100 करोड़ कमाने वाला बाज़ीगर । कुछ लोग उन्हें बालीवुड का बादशाह कहते हैं तो कुछ किंग ख़ान ।शाहरुख खान बिज़ी हैं , स्ट्रेटजी बनाने में , टेलीविजन शो के गेस्ट बनने में और मुल्क के अलग अलग शहरों में ,उनकी चैन्नई एक्सप्रेस रेलवे की दुरन्तो और राजधानी से भी तेज़ रफ्तार से दौड़ रही है ।

 फिल्म रिलीज होने के पहले तीन दिन में फिल्म ने सौ करोड़ रुपए का बिज़निस करके इतिहास बना दिया और साबित कर दिया कि शाहरुख फिल्मी दुनिया के असली शहंशाह है । रोज़ाना 14 से 18 घंटे काम में लगे शाहरुख जब दिल्ली में मिले तो बोले - बहुत दिनों बाद कल पूरी नींद सो पाया ,तो मैंने कहा - सबकी नींद उड़ाकर ...एक ज़ोरदार सी हंसी …..


सवाल- मुबारकबाद,तीन दिन में सौ करोड़ ,आपने तो दूसरों की नींद तो उड़ा ही दी ,
साथ ही एक नया पैमाना तय कर दिया फिल्म के हिट होने का ।

शाहरुख़- नहीं , ऐसा नहीं है , मैं इसे सिर्फ एक नंबर समझता हूं , एक आकंड़ा , सौ करोड़ और दो सौ करोड़ कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता । अगर सोचना है तो हम सोच सकते हैं कि जब तीन दिन में हम सौ करोड़ का बिज़निस कर सकते हैं तो दो दिन में या सिर्फ एक दिन में क्यों नहीं कर सकते और ये नंबर तो बढ़ता रहता है ,एक ज़माने में मेरी एक फिल्म ने पांच करोड़ का बिज़निस किया तो हंगामा हो गया था .

सवाल - हां , जब आप कमा लेते हैं तो ऐसा कह सकते हैं कि कोई फर्क नहीं पड़ता सौ करोड़ से ,क्या पैसा कमाना इतना आसान काम है ।

शाहरुख़- बिलकुल नहीं , मैं ये नहीं कह रहा कि पैसा कमाना आसान काम है , मुश्किल है ,बहुत मुश्किल है ,लेकिन इसमें रिस्क इन्वोल्व है जितनी बड़ी रिस्क आप लेते हैं उतना बड़ा चांस भी होता है पैसा कमाने का ।

सवाल- बहुत से फिल्म समीक्षक, आलोचकों को आपकी फिल्म ज़्यादा पसंद नहीं आई है तो क्या ये माना जाए कि बाक्स आफिस अच्छी फिल्म की गारंटी नहीं है ।

शाहरुख़- हमारे यहां हर किसी को कुछ भी कहने , लिखने का अधिकार है और मैं इसको लेकर बुरा भी नहीं मानता । मैं कहता हूं कि ये फिल्म पापुलर बाक्स आफिस फिल्म है । हमारी कोशिश थी कि ये फिल्म परिवार में हरेक को पसंद आए, हर उम्र, ,हर जेनर के लिए कुछ ना कुछ हो उसमें और यही वज़र रही मेरे ख्याल से के सबको पसंद आ रही है ,

फिर इस दौरान छुट्टियां भी रहीं तो उसका भी फायदा मिला और अगर आप जिसे अच्छी फिल्म कहते हैं वैसी फिल्म तीस चालीस दिन में आराम से बन जाती है. यकीन मानिए चैन्नई एक्सप्रैस इज ए काम्पलीकेटेड फिल्म और इसमें बहुत मेहनत हुई है ।

सवाल- अच्छा क्रिटिक्स को छोड़िए, आपके परिवार में बेटा और बेटी ने फिल्म देखी है , कैसी लगी उन्हें , क्या रिएक्शन रहा उनका ,क्या वो भी फिल्मों में आना चाहते हैं ।

शाहरुख़ - मेरी बेटे को बहुत अच्छी लगी और बेटी को अच्छी लगी , खासतौर से बेटी ने कहा कि पापा ,अच्छी बात है कि उसमें हीरो यानी मैं, हीरोईन के लिए बहुत फाइट नहीं कर रहा हूं 

,लेकिन स्ट्रांग बहुत हूं यानी उसके लिए हमेशा साथ खड़ा।मेरे बेटे का इंटरेस्ट तो अभी स्पोर्ट्स में ज़्यादा है ,लेकिन बेटी को एक्टिंग का शौक है ।लेकिन मैं बच्चों को और सभी बच्चों को कहना चाहता हूं कि पहले पढ़ाई पर ध्यान दें ,कम से कम ग्रेजूएशन करें और फिर जो करना चाहें ,उस पर सोचें और करें ।

सवाल - इस फिल्म का निर्देशन रोहित शेट्टी ने किया है और हीरो है शाहरुख खान , असल में इसे किसकी फिल्म कहा जाए ।

शाहरुख -ये फिल्म रोहित शेट्टी स्टाइल में शाहरुख की है और शाहरुख की स्टाइल में रोहित शेट्टी की यानी थोड़ा रोमांस है और थोड़ा एक्शन विद कामेडी।कामेडी देखने वालों को साथ में राहुल का रोमांस भी मिल रहा है देखने को और राहुल के रोमांस के साथ एक्शन भी ।


सवाल- इस फिल्म में भी एक बार फिर आप ट्रैन पर है और स्टेशन से छूटती ट्रैन में एक बार फिर हीरोइन यानी दीपिका का हाथ पकड़ कर चढ़ा रहे हैं ,यदि किसी फिल्म से सिचुएशन उल्टी हो कि हीरोईन ट्रैन पर हो और आप स्टेशन पर तो किस हीरोइन का हाथ पकड़ना चाहेंगे ।

शाहरुख़- ( ज़ोरदार हंसी ) ….अरे साहब , कोई भी हीरोइन हो , मैं तो हरेक का हाथ पकड़ कर ट्रैन पर चढ़ने को तैयार हूं और मेरा बस चले तो मैं चाहूंगा कि ट्रैन की हर बोगी में अलग अलग हीरोईन मेरा हाथ पकड़ कर मुझे चढ़ा ले ।

सवाल- आप इस चैन्नई एक्सप्रेस को कामेडी फिल्म मानते हैं ,लेकिन मुझे ये कमोबेश पालिटिकल मैसेज वाली फिल्म लगती है । जैसे इस चुनावी साल में एक मैसेज है - डोंट अंडरएस्टीमेट द पावर आफ ए कामन मैन और फिर आप कहते हैं कि आज़ादी के 66 साल बाद भी बेटी आज़ाद नहीं है अपने मन का करने के लिए ।

शाहरुख – मेरा मैसेज बेटियों को लेकर ज़रुर है ,क्योंकि आज भी हमारी सोसायटी में हम ज़्यादातर लोग बेटियों के साथ ऐसे ही बर्ताव करते हैं । बात बात पर उसे काटने ,टुकड़े टुकड़े कर देने की धमकी देते हैं ।

तो आप पूरी कालोनी ,शहर के बाप तो बन सकते हैं लेकिन अपनी बेटी के पिता नहीं , मैं चाहता हूं कि हम अपनी बेटी से मौहब्बत करें ,उसे मौका दें , आज़ादी अपना मन का करने की ।
सवाल- तो फिल्मों में सीधे संदेश क्यों नहीं देते , क्या आप अपने को सोशल रिफोर्मर नहीं मानते ।

शाहरुख़- मैं खुद को पहले एक्टर ,फिल्म मेकर मानता हूं यानी मेरा पहला काम है अच्छी फिल्म बनाना ।सोचता हूं कि अगर सौ लोग मेरी फिल्म देंखें तो उन्हें पसंद आए और उनमें से चार लोगों तक भी मेरा मैसेज पहुंच जाए तो बहुत है ।और यूं सोचिए यदि सिर्फ मैसेज के चक्कर में फिल्म अच्छी नहीं बनी तो फिर खुद को भी धरने प्रदर्शन के स्टेज पर ही बैठना होगा ।

सवाल - चैन्नई एक्सप्रैस में एक और अहम मुद्दा है भाषा का ,लेकिन मैं दूसरा सवाल पूछना चाहता हूं कि यदि इस फिल्म का सीक्वल बनाएंगें तो फिर कौन सी भाषा होगी ।

शाहरुख- अभी तो इसके सीक्वल की कोई बात नहीं हैं ,लेकिन सीक्वल बना तो फिर चैन्नई एक्सप्रैस की हीरोईन पंजाबी तो हो नहीं सकती ,लेकिन मैं सोचता हूं कि ऐसा करना चाहिए कि हीरो और हीरोईन दोनों की भाषाएं ऐसी हों जो दोनों को ही नहीं समझ आती हो ,क्योंकि मेरा मैसेज तो है प्यार के लिए किसी भाषा की ज़रुरत नहीं होती ।

समाप्त , विजय त्रिवेदी
फोटो - शैलेन्द्र पांडे 

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