Monday, August 5, 2013

meet milkha - हज़ारों बुर्कानशीं देख रही थी


विजय त्रिवेदी

 वो नंगे पैर भागता रहा 
एथलीट मिलखा सिंह से ख़ास बातचीत

संघर्षमेहनत और समर्पण

उम्र 77 साल तेज़ी -17 साल सी ,हौसला आर्मी के जवान जैसा रुकते नहीं हैं पांव अब भी दौड़ रहे हैं ताकि मुल्क आगे हो सके जीत सके । मैडल हासिल कर सके । पूरी दुनिया में नाम रोशन हो मुल्क का । मिलखा सिंह फ्लाईंग सिख । 80 में से 77 रेस दौड़ने वाला एथलीट । नंगे पांव भागने वाला एथलीट ।


 भाग मिलखा भाग ,फिल्म जब आई तो नौजवान हिंदुस्तान को एक हकीकत से रुबरु होने का मौका मिला ।समझ आया कि जीतना तो सब चाहते हैं ,लेकिन जीता कैसे जाता है । कैसे बनते हैं विजेता ,हीरो मिलखा सिंह ।

सवाल ज़िंदगी तो खुद एक दौड़ है असल में तो आप उसमें विजेता रहे हैं ,इतनी लंबी दौड़ तो शायद ही कोई दौड़ता होगा ।
मिलखा सिंह – ये तुमने बिलकुल सही बात कही है कि ज़िंदगी तो खुद एक दौड़ है । चाहे किसी भी फील्ड में रहो कोई काम करो दौड़ ही तो रहे हो और उसमें जीत हासिल करना उसमें नाम कमाना अहम है और फिर देश के लिए नाम कमाना और ऊंचा करना आसान बात नहीं है ।
आजकल लोग आपस में गली मौहल्लों में नहीं जानते तो देश और दुनिया भर में पहचान बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है ।

सवाल -भाग मिलखा भाग फिल्म जब आई तो लगा सूरज पर बरसों से पड़े बादल हट गए हैं और रोशनी फिर से महकने लगी है आपको कैसा लगता है ।

मिलखा सिंह – बहुत अच्छा लग रहा है देशभर से ही नहीं दुनिया भर से फोन आ रहे हैं लेकिन उससे ज़्यादा अच्छा इस बात के लिए लग रहा है कि लोगों को पता चल रहा है कि मिलखा सिंह ने कितनी कठोर मेहनत की ,नंगे पैर भागता रहा और तमाम तरह की मुश्किलें भी उसके सामने आईं । 

साथ ही उस वक्त पार्टिशन का बंटवारे का दौर था हर तरफ लाशें ही लाशेंलाशों से भरी गाड़ियां । खुद के सामने अपने लोगों की होती हत्याओं का खौफ और गम ऐसे हालात से निकलना और आगे बढ़ने का दौर था वो ,ये सब फिल्म से पता चलता है ।

सवालफिल्म तो दरअसल फिक्शन होती है फसाना यानी हकीकत से दूर तो येफिल्म हकीकत के कितने करीब है ,क्या उसे देखकर मैं वैसे ही मिलखा की तस्वीर अपने दिमाग में बना सकता हूं ।

मिलखा सिंह – फिल्म में 80 फीसदी हकीकत है और फिल्म ने उस वक्त के हालात के साथ साथ मिलखा की हार्डशिप के बारे में भी जानकारी दी गई है ।60 साल से कम उम्र के लोगों को तो विभाजन के वक्त और उस समय खिलाड़ियों एथलीट को मिलने वाली सुविधाओं या मुश्किलों के बारे में पता ही नहीं है और सबसे अच्छी बात है कि अब तक जो फिल्में इस तरह की बन रही है चाहे वो महात्मा गांधी पर हो या भगत सिंह पर सब उनके जाने के बाद बनी है यह तो शायद पहली फिल्म होगी जो मेरे रहते हुए बनी है । फिल्म में बहुत सी ऐसी चीज़े हैं जो कुछ लोगों को गंदी लग सकती है ,लेकिन मैंने कहा कि सच सबको जानना चाहिए ।

 अब जो सोसायटी के बड़े बड़े लोग हैं वो क्य़ा नहीं करते ,लेकिन बड़े होने के बाद भूल जाते हैं या फिर बताने की हिम्मत नहीं रखते ।


सवाल सुना है कि जब पाकिस्तान में आपने अब्दुल खालिक को हराया तो स्टेडियम में बैठे हज़ारों बुर्कानशीं बेपर्दा हो गई थी उनके अपने हीरो को हराने वाले सुपर हीरो को देखने के लिए ।
मिलखा सिंह – हां उस वक्त जब मैंने अब्दुल खालिक को हराया तो वहां स्टेडियम में बैठे लोगों को यकीन ही नहीं हुआ और फिर जब मुझे पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाने को कहा गया।

 मैंने राउंड लागते हुए वेव किया तो पूरा स्टेडियम शोर से भर गया और वहां करीब दस हज़ार बुरकानशीं बैठी थी तो सबने देखना चाहा कि वो कौन है जिसने उनके हीरो को हराया ।
सवाल क्या वज़ह रही थी कि आप उस वक्त पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे और पंडित नेहरु के कहने पर आपको फैसला बदलना पड़ा ।क्या आपको पाकिस्तान जाने से तकलीफ हुई ।
मिलखा सिंह – वज़ह बंटवारा थीजिसमें हमने देखा कि किस तरह लोगों को मारा गया हज़ारों लाखों हत्याएं हुई लाखों लोग बेघर हो गए रिफ्यूजी बन गए मैंने खुद अपने लोगों की हत्या होते देखा था ,लेकिन फिर पंडित नेहरु ने समझाया कि अब पाकिस्तान हमारा पड़ौसी मुल्क है और हम उससे दोस्ती का रिश्ता बनाना चाहते हैं खेल से मोहब्बत बढ़ती है तो तुम्हें उस पैगाम के साथ वहां जाना है ।

पुरानी बातों को भूलना होगा और फिर मैं गाय तो हैरान था कि वाघा बार्डर से लोकर लाहौर तक सड़क के दोनों तरफ हज़ारों बच्चे और लोग दोनों मुल्कों के झंडे हाथ में लेकर हमारा स्वागत कर रहे थे मैं खुली जीप में लाहौर तक पहुंचा था ।
सवाल पाकिस्तान ने तो मिलखा को फ्लाईंग सिख बना दिया ,क्या सोच में बदलाव आया पाकिस्तान को लेकर । अब भी हमारे मुल्क में पाकिस्तान से क्रिकेट मैच हो या हाकी जंग जैसा माहौल ही रहता है कब तक चलेगा ।
मिलखा सिंह – बिलकुल ठीक बात है पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने तब मुझे फ्लाईंग सिख का खिताब दिया था और ये बात अच्छी नहीं है कि हम जंग जैसा बर्ताव रखें

खेल से प्यार बढ़ता है मोहब्बत का पैगाम होता है खेल तो उसी के साथ आगे बढ़ें । खेल में जीत हार को चलती रहती है तो जीतना हारना महत्वपूर्ण नहीं हैं ज़रुरी है भावना ।

सवाल अब बात स्प्रिंटर मिलखा सिंह कीआज तक अकेला एथलीट जिन्होंने कामनवेल्थ गेम्स में अकेले गोल्ड मैडल जीता पचास साल में भी रिकार्ड नहीं टूटा ये आपको सुकून देता है या तकलीफ ।
मिलखा सिंह – ये सच है कि वो रिकार्ड अब 55 साल में भी नहीं टूटा ,लेकिन ये सुकून नहीं तकलीफ देता है कि हमारा 120 करोड़ के मुल्क में भी हमनें अभी तक ऐसे एथलीट तैयार नहीं किए जो ये रिकार्ड टूट पाए जबकि अब तो बहुत सी सुविधाएं हैं ,साधन हैं ।

 मिलखा कुछ नहीं हैं ,मुल्क अहम है लोग इंडिया के तौर पर जानते हैं तो इंडिया जीतना चाहिएउसका नाम रोशन होना चाहिए ।
सवाल-1956 में लास एजेंलिस में 400 मीटर की दौड़ में मिलखा 250 मीटर के बाद धीमा पड़ गए पेस स्लो डाउन हो गई ,क्या आप 200 मीटर दौड़ रहे होते तो मैडल हासिल हो जाता ।
मिलखा सिंह -बिलकुल जीत जाता 200 मीटर की दौड़ सबसे बेहतर रिकार्ड था मेरा 200 मीटर पर 21 सेंकड में ,लेकिन मैं हमेशा ही 400 मीटर की रेस में हिस्सा ले रहा था ,जीत भी रहा था ,इसलिए मैंने उसमें ही हिस्सा लिया और 80 में से 77 रेस मैंने जीती हैं 400 मीटर की ।
सवाल उस वक्त सेना में आपके एथलीट बनने की शुरुआत हुई क्या वो आसान रहा सफर ।
मिलखा सिंह – एथलीट बनने का पूरा क्रेडिट आर्मी को जाता है कि उन्होंने मुझे पहचाना । उस वक्त आर्मी में क्रास कंट्री रेस होती थी जिसमें मुझे 6ठा स्थान मिला था । तब तक तो मुझे पता भी नहीं था कि क्रास कंट्री रेस क्या होती है ।

 आर्मी के कोच ने मेरी ताकत को पहचाना और उसे तराश कर एथलीट बना दिया । वैसे बचपन में मैं स्कूल दस किलोमीटर पैदल जाता था रोजाना और तब हम धूप में दौड़कर जाया करते थे मिट्टी तपने लगती थी तो तेज़ दौड़ा करते थे ,शायद उससे भी मुझे बहुत मदद मिली ।

सवाल दुनिया ने कब पहचाना और माना मिलखा सिंह को कि उसका कोई मुकाबला नहीं ।
मिलखा सिंह – 1958 के एशियाड़ खेलों में टोक्यो में मैंने 200 और 400 मीटर की रेस जीती थी ,वो मेरा पहला मौका था । उसके बाद हम कामनवेल्थ खेलों के लिए कार्डिफ पहुंचे तों वहां मुझे कोई नहीं पहचानता था ,लेकिन जब वहां मैं जीता तो हंगामा हो गया ।

 वहां के अखबारों में छपा कि एक नंगे पैर दौड़ने वाला एथलीट जिसे एथलेटिक्स की स्पेंलिग भी ठीक से नहीं आती थी तब । उन खेलों में दुनिया भर के बेहतरीन एथलीट मौज़ूद थे ।

सवाल -क्या वज़ह है कि 120 करोड़ से ज़्यादा के मुल्क में मिलखा हासिल करने के लिए पचास साल इंतज़ार करना पड़ता है अब तो हम उतने गरीब मुल्क भी नहीं हैं ।
मिलखा सिंह – ये ही तो सबसे बड़ी तकलीफ की बात है कि अब तो बहुत सुविधाएं हो गई हैं ,अकादमी हैं स्टेडियम हैं और सरकारी मदद भी है ,दूसरे मुल्कों को देखिए ,खासतौर से चीन को । हमें खुद के भीतर झांकना होगा कि हमें मुल्क के लिए जीतना है ।जब मुल्क दिमाग में होगा तो ज़्यादा ताकत से खेल पाएंगें ,लड़ पाएंगें और जीतेंगें भी ।

सवाल क्यों नहीं तैयार कर पा रहे एथलीट्स और खिलाड़ीक्या राजनीतिक दखल  एक बड़ी वज़ह है कि ज़्यादार फैडरेशन्स और अकादमियों पर राजनेताओं का कब्ज़ा है ।
मिलखा सिंह – अब तुम मुझे कंट्रोवर्सी में डालोगे । मुझे राजनेताओं और अफसरों से ऐतराज़ नहीं हैं । मैं कहता हूं रहे राजनेता ,लेकिन रिजल्ट तो दो अपने खिलाड़ियों को तैयार करो मैडल लाओ रिजल्ट होना चाहिए । ये नहीं चल सकता कि रिजल्ट भी ना दो और सालों साल कब्ज़ा मार कर बैठे रहो ।

सवाल आप भी पंजाब में फैडरेशन के मुखिया रहे बरसों तक क्या कुछ हासिल कर पाए और क्य़ा बाधाएं आपको महसूस हुई ।
मिलखा सिंह – हर आदमी की अपनी सीमाएं होती हैं और मेरी समझ से हर कोई कुछ खास करना चाहता है । मैंने वहां रहते हुए बहुत से अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट तैयार किए । मैंने कहा कि बेहतर एथलीट को तैयार करने के लिए उसे एक छत के नीचे ही सारी ज़रुरी सुविधाएं मुहैय्या करानी चाहिए। मेरे मुखिया रहने के दौरान ही पंजाब में पहला स्पोर्ट्स स्कूल खुला । हमने हाकी और वालीबाल के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी तैयार किए । अब मैं इसके लिए खिलाड़ियों को दोषी नहीं मानता । वे तैयार होते ही अपने लिए नौकरी ढूंढने लगते हैं और जो कंपनियां उन्हें अपने यहां मौका देती हैं वे पिर उनके होकर रह जाते हैं और अकादमी को भूल जाते हैं लेकिन क्या करें हमारे यहां का सिस्टम ही कुछ ऐसा है ।

सवाल आजकल बहुत से एथली्टस डोपिंग मामले में फंसते दिख रहे हैं क्या जानकारी का अभाव है या कोई और वज़ह ।
मिलखा सिंह – हां उसकी एक बड़ी वज़ह जानकारी का अभाव होना है लेकिन इसके लिए हमारे कोचसरकार और अकादमी को ध्यान देना चाहिए । उनके खान पान और दवा आदि पर भी सरकार को ध्यान देने की ज़रुरत होती है ।

आखिरी सवाल नई पीढ़ी के लिए क्या संदेश है ।

मिलखा सिंह जो भी काम करो मन से करोपूरी ताकत से करो स्ट्रगल और डेडिकेशन दोनों बहुत ज़रुरी है ,कड़ी मेहनत के बिना कुछ मिलने वाला नहीं और निराश भी नहीं होना है कभी ।
        
        विजय त्रिवेदी 
    फोटो -गणेश बिष्ट
    सौजन्य - राजस्थान पत्रिका 

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