Sunday, August 4, 2013

jism kee baaten- जिस्म जिस्म के लोग


विजय त्रिवेदी

रूहानी,रूमानी और जिस्मानी

तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव ,
मैं कैसे पढूंगा,मुझे किताब तो दे ।
राहत इन्दौरी साहब के इस शेर को पढ़े वक्त गुज़र गया ,लेकिन क़िताब अब जाकर मिली, जिससे बदन की लिखावट को समझा जा सके । जिस्म की खुशबू , जिस्म की धड़कन और जिस्म के रंग अंधेरे में समझ आने लगे ।
अब समझ आने लगा कि
सूरज के उगने ,न सूरज के ढलने से …
वक़्त बदलता है जिस्मों के बदलने से ।
कहते हैं कि

कभी दिल ,कभी दिमाग,कभी नज़र में रहो ,
ये सब तुम्हारे ही घर हैं ,कहीं भी रहो ।
रूहानी,रूमानी और जिस्मानी ,सच में लग रहा है कि सब एक ही तो है रूहानी भी , रूमानी भी , जिस्मानी भी ।
खुसरो नदिया प्रेम की , उल्टी वाकी धार,
जो उबरा सो डूब गया ,जो डूबा सो पार ।

रूह अपने साथ जिस्म को भी डुबा देती है ..प्यार में ...बहुत देर से लफ़्ज़ों की ख़ामोशी थी लेकिन बात हो रही थी । छुअन भी कैसी कैसी होती है ...और छू के भी कैसे कैसे जवाब दिए जाते हैं । जिनके जीवन में स्पर्श नहीं वो उदास जिस्म के मालिक हैं ।

जिस्म को इससे बेहतर कैसे समझा जा सकता है - कब्रिस्तान में कई मज़ार हैं -शहज़ादों की और शहज़ादियों की , कैसे पहचानोगे . जिन पर तख्ती बनी है वो शहज़ादियों की है और जिन पर कलम वो शहज़ादों की - क़लम तख़्ती पर लिखती है …..एकाएक समझ आ गया ।


जिस्म को समझना आसान तो कतई नहीं है ,लेकिन उसकी ज़ुबां को समझ कर उस पर ऐसे लिखना कि खुद ब खुद महसूस होने लगे जिस्मों की गर्माहट ,बहादुरी से कम नहीं ।

कपड़े समझ पे पर्दा डाल देते हैं , किसी को बिल्कुल साफ साफ समझना हो तो बिना कपड़ों के बात होनी चाहिए और फिर सांसों से राहों का रिश्ता समझ आने लगता है और उसके साथ शाज़ी समझाते हैं ज़िंदगी ,जिस्मों की बात । जिस्मों के साथ दिल धड़कने लगते हैं , धड़कनें मिलने लगती है , कहीं आकर ताल मिल जाती है तो लगता है कि दोनों दिल एक साथ धड़क रहे हैं । ताकि कोई चाहे तो पहचान ले और समझ ले …

टेलीविजन पर बरसों बरस ज़िंदगी के रंगों को समझाने में माहिर शाज़ी ज़मां का नया उपन्यास जिस्म जिस्म के लोग जितना छोटा है उतना ही ज़िंदगी को गहराई से समझाने में माहिर ।
ओशो के बाद शायद पहली बार किसी को इतने करीब से ज़िंदगी को सच में समझते देखा है -झूठे बयानों ,व्याख्यानों , भाषणों , प्रवचनों से बहुत दूर , फिर भी पाप नहीं लगती ज़िंदगी ।
जिस्मों जिस्मों होता आया ,
अब ये जिस्म समझ आया ।।
बहुत मुबारकबाद ।


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