Monday, August 26, 2013

black magic -डरपोक हैं हम


विजय त्रिवेदी


सबसे बड़ा डर है कि हम डरते हैं 

वैज्ञानिक शिवा विश्वनाथन से ख़ास बातचीत 

वे वैज्ञानिक हैं , वे एक्टिविस्ट हैं , सुधारक हैं और मुद्दों पर लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले हैं ।सरकारें आमतौर पर उनसे खुश नहीं रहती , राजनेता नाराज़ रहते हैं, धर्म गुरु उन्हें अपना दुश्मन सरीखा मानते हैं तो समाज को सुधारने वाले लोग भी उनकी बेबाकी से कमोबेश परेशान रहते हैं

 उन्हें लगता है सच बोलना ज़रुरी है और उसे लिए उससे भी ज़्यादा ज़रुरी है निडर होना , डरना नहीं......
किसी से भी और कभी भी ,लेकिन क्या हम ऐसे समाज में जी रहे हैं . वैज्ञानिक, प्रोफेसर शिवा विश्वनाथन ।

सवाल- सुधारक और एक्टिविस्ट डा नरेन्द्र दाभोलकर की सरेआम हत्या से देश में गुस्सा है , नाराज़गी है , कैसे देखते हैं आप इस घटना को ।

विश्वनाथन – मुझे कम लग रहा है ये गुस्सा । डा दाभोलकर जैसे हिम्मती लोगों की हत्या ना केवल शर्मनाक है बल्कि हमारी सोसायटी पर ,उसकी सोच पर एक बड़ा सवाल है कि क्या हम दूसरे विचारों को जगह देने को तैयार नहीं हैं ।

डा दाभोलकर हमेशा से तर्कवादी रहे हैं । वो काले जादू के खिलाफ लगातार लड़ते रहे जो आज भी हमारे गांवों में ज़िंदा है । ये अलग बात है कि मैं उनके विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं हूं लेकिन मैं उन्हें सलाम करता हूं । उनके जज़्बे को ,उऩकी हिम्मत को सलाम करता हूं ।

सवाल- डा दाभोलकर काले जादू के खिलाफ जिस कानून की बात कर रहे थे , मांग कर रहे थे ,सरकार उसके लिए तैयार हो गई है ।

विश्वनाथन- यही तो बात मैं कह रहा हूं कि डा दाभोलकर आखिर क्या मांग कर रहे थे , उससे सोसायटी का क्या नुकसान होने वाला था । लेकिन हमारी सोसायटी में इतना इनटालरेंस हैं कि हम किसी दूसरी बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं ।

फिर हर बात को सेक्यूलरिज़्म से जोड़ देते हैं . तर्कवाद को रेशनेलिज़्म को सेक्यूलरिज़म से जोड़ने की गलती मत कीजिए और ना ही इसे धर्म के खिलाफ खड़ा करने की साज़िश कीजिए ।


सवाल - तो क्या आप ये मानते हैं कि विज्ञान और धर्म आपस में विरोधाभासी नहीं हैं ,क्या वैज्ञानिक धार्मिक भी हो सकता है ।

विश्वनाथन – पहली बात धर्म और विज्ञान विरोधाभासी नहीं हैं ,क्योंकि दोनों तार्किक हैं , दोनों तर्कवाद को मानते हैं । खासतौर से हिंदू धर्म और इस्लाम विज्ञान के खिलाफ नहीं हैं । ईसाईयत में कुछ चर्च विज्ञान के खिलाफ रहे हैं , वहां भी पूरी ईसाइयत को क्रिशचनिटी को धर्म के खिलाफ मत खड़ा कीजिए ।

 हमारे यहां तो रामानुजम हैं जे वी रमन साहब रहे हैं, क्या उनके धार्मिक होने से वे एक बेहतर वैज्ञानिक नहीं माने जाते । उनका कोई मुकाबला नहीं हैं । इसलिए धर्म और विज्ञान को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की भूल या कहूं कि साज़िश मत कीजिए ।

सवाल - आज का हिंदुस्तान नौजवानों का मुल्क हैं , यहां साठ फीसद आबादी नौजवान है,लेकिन इनटालरेंस लगातार बढ़ रही है , क्या वज़ह आप मानते हैं ।

विश्वनाथन – ये बात ठीक है कि हमारे मुल्क में इनटालरेंस बढ़ रही है , बात बात पर हम इनटालरेंट हो जाते हैं ,लेकिन इसमें सवाल माडर्न और पुराने या बुज़ुर्ग होने का सवाल नहीं हैं । सवाल है सोच का और उसमें बदलाव का , लेकिन क्या हम इस पर काम कर रहे हैं ।

 क्या हमारे वैज्ञानिक , क्या हमारे बुद्दिजीवी, हमारे मीडिया के लोग और संस्थान इस पर कोई कोशिश कर रहे हैं ,मुझे नहीं लगता कि ऐसा है .उस पर काम करने की ज़रुरत है . विचार पसंद ना हों तब भी सुनने की ज़रुरत है , उसे आगे बढ़ाने की ज़रुरत है ।

सवाल - तो क्यों नहीं हो रहा , क्यों आपको लगता हैं कि हमारे वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी और पत्रकार इस पर काम क्यों नहीं कर रहे ।

विश्वनाथन – हम डरपोक हैं , डरपोक सोसायटी है। वैज्ञानिकों को डर लगता है सच बोलने से । एक ज़माना था नेहरु के वक्त और इंदिरा गांधी के वक्त वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी जो बात सच होती थी, ठीक होती थी सोसायटी के लिए उसे बेबाकी से बोलते थे , आज वो बात दिखाई नहीं देती और मीडिया ।

 आप बताइये कि क्या करते हैं , टीवी चैनल्स पर तर्कवाद पर ,दाभोलकर के बहाने से ही सही बहस करते हैं प्राइम टाईम पर और उसमें दो तर्कवादी बुलाते हैं और चार बाबा ,गुरु या भजनमंडली वाले और फिर उनके चेले खड़े हो जाते हैं कि आपने हमारे गुरु के खिलाफ क्यों
बोला । अखबारों में हर हफ्ते चार चार सप्लीमेंट छापते हैं आप धर्म, आस्था और भजन मंडली के नाम पर , कम से कम एक सप्लीमेंट तो मुझे दीजिए तर्कवादियों को जो अपनी बात कह सकें ।

सवाल - आपने राजनेताओं का ज़िक्र नहीं किया , क्या वे अंधविश्वासों या ऱुढ़िवादियों को नहीं बढ़ा रहे ,क्या उन्हें कोई चिंता है इस बारे में ।
विश्वनाथन – यही तो दुर्भाग्य है इस देश का , हमारे राजनेता अपने वोटों के अलावा किसी की चिंता नहीं करते हैं । उनका धर्म को, सच को और संस्कृति को देखने का नज़रिया अलग है ।

 वे सब चीज़ों को वोट के नज़रिए से देखते हैं कि कब किस नज़रिए से वोट का फायदा होगा और इसीलिए इन सब चीज़ों के ख़िलाफ लड़ाई को ताकत नहीं मिलती है और इनटालरेंट लोगों को ताकत मिलती है ।

सवाल - बात सिर्फ अंधविश्वासों और रुढ़ियों की नहीं है, आज तो फिल्मों को लेकर , किताबों को लेकर , लेखकों और समाज में काम करने वालों को लेकर भी विरोध दिखाई देता है ।

विश्वनाथन – ये ही तो इनटालरेंस हैं । फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है लेकिन उसके बाद दस तरह के सेंसर बोर्ड मान लिए हैं हमनें । कोई किताब बाज़ार में आती है तो उसको लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं । मैं उन प्रदर्शनों के खिलाफ भी नहीं हूं ,लेकिन क्या हम अभिव्यक्ति की आज़ादी देने को तैयार नहीं हैं ।

 माडर्न होने , आधुनिक होने का सबसे पहला मायने हैं दूसरेके विचारों को जगह देना । लेकिन उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं ,गुरु महाराज , बाबाओं की भजन मंडलिया और उनके चेलों की भीड़ जो किसी को सुनना हीं नहीं चाहते और पालिटिकल पार्टिज़ उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखाती ।

 अब मुझे बताइए वो वेलेंटाइन डे को लेकर क्या और किस बात विरोध है । अच्छा लगा ,मुझे अभी कि कर्नाटक चुनावों में इस तरह के सोच वालो लोगों के खिलाफ खड़े हुए और उन्हें हरा दिया । इसमें बात किसी खास पालिटिकल पार्टी की नहीं हैं , विचारों की है , सोच की है , सबसे ज़रुरी है दूसरों को स्पेस देना ।

सवाल- क्या आप इसे कट्टरवाद मानते हैं , फंडामेंटलिज़्म और क्या वज़ह है इसकी ।

विश्वनाथन – ये पालिटिक्स आफ फंडामेंटलिज़्म है या यूं कहिए कि फंडामेंटलिज़्म आफ पालिटिक्स है और इसमें उम्र का सवाल भी नहीं है कि विरोध करने वाला कौन है नौजवान है या बुजुर्ग है । सवाल है कि हम तर्कवादियों के खिलाफ हैं । 

हम उनके तर्क सुनने को तैयार नहीं है इसलिए हर उस बात को दबाने की कोशिश करते हैं जो हमें पसंद नहीं हैं । हमारे विचारों से मेल नहीं खाती है । मुझे हैरानी इस बात पर होती है कि हिंदुस्तान और हिंदू धर्म में हमेशा से तर्कवादियों के लिए जगह रही है ।

 हिंदू धर्म तो हमेशा दूसरों की बात सुनने की पैरवी करता रहा है इसलिए यहां पर एक ही धर्म की अलग अलग तरह से व्याख्या करने वाले , उन्हें समझाने और समझने वाले और उसका प्रचार करने वाले लोगों पैदा होते रहे हैं और हमनें उनको सुना है ,भले ही हम उनसे सहमत नहीं रहे हों ।

सवाल - कौन है इसके लिए ज़िम्मेदार , कौन है जो इसे ठीक कर सकता है , सुधार सकता है ।

विश्वनाथन – ये फेल्योर आफ द स्टेट है । सरकार की हार है या कमज़ोरी है कि वो इसके खिलाफ ताकत से लड़ना नहीं चाहती या उसकी इच्छाशक्ति नहीं है । ये आप कह सकते हैं कि दाभोलकर थोड़ा पागल है , हां तो पागलपन तो ज़रुरी है , बिना उसके कोई लड़ ही नहीं सकता । हम तो डरपोक हैं ।

 मेरा जो सबसे बड़ा डर है वो यही डर है कि हम डरते हैं । हम लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं । हम बहस के लिए तैयार नहीं हैं ।


सवाल - आखिरी सवाल ,तो फिर रास्ता क्या है , क्या ये सब ऐसे ही चलता रहेगा और हम इसे माडर्न इंडिया या नौजवान हिंदुस्तान कहेंगें ।

विश्वनाथन-मेरी चिंता ये है कि ये सब रवैया , हमारा तौर तरीका , हमारा बर्ताव जम्हूरियत के लिए बेहद नुकसानमंद हो सकता है ,डिजास्ट्रस फार डेमोक्रेसी ।तो डर छोड़ना पड़ेगा ।

 सरकार का डर भी छोड़ना पड़ेगा , वोटरों का लालच भी छोड़ना पड़ेगा और समाज में, समाज के लिए कई बार समाज के खिलाफ भी खड़ा होना पड़ता है । उसके लिए बस एक चीज़ चाहिए हिम्मत। इसमें धर्म और विज्ञान के बीच लड़ाई का मसला नहीं हैं ,उसे बहाना मत बनाइए । धर्म और विज्ञान साथ साथ चल सकते हैं सिर्फ हमें आगे बढ़ना है और डर छोड़ना है ।
समाप्त , विजय त्रिवेदी
सौजन्य- राजस्थान पत्रिका








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