Monday, July 1, 2013

varun gandhi exlusive interview


विजय त्रिवेदी


बीजेपी के युवा महासचिव वरुण गांधी से खास मुलाकात

सिर्फ एक चेहरे से देश नहीं जीता जा सकता

नेहरु -गांधी परिवार से जुड़े हैं ,लेकिन विरासत का टैग चिपका हुआ नहीं है ।गांधी परिवार की बपौती माने जाने वाली पार्टी कांग्रेस के साथ नहीं है , बीजेपी में हैं।किसी भी राष्ट्रीय पार्टी में सबसे कम उम्र के महासचिव बने हैं ,33 साल की उम्र में बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव ।
 नौजवानों जैसी एनर्जी है,लेकिन लगता है कि अभी हाथ बंधे हुए से हैं । दिल्ली के पाश इलाके ज़ोर बाग की कोठी के खूबसूरती से सजा करीनेदार ड्राईंगरुम में ।सरकारी आवास  से बार बार फोन की घंटी बज रही है , कार्यकर्ता इंतज़ार कर रहे हैं ।

 संजय गांधी और मेनका के बेटे वरुण गांधी के पास कहने और करने के लिए बहुत कुछ है ,शायद इसीलिए बैठ कर बातचीत करना उनके लिए मुश्किल लगता है ,लेकिन सिल्वर स्पून राजनेता को राजनीति की खुरदरी ज़मीन महसूस होने लगी है ।

सवाल-सबसे कम उम्र में बीजेपी जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी का महासचिव बनने के लिए मुबारकबाद ,लेकिन गांधी परिवार का नाम काम आया वरना इस उम्र में तो प्रदेश में भी नंबर नहीं आता लोगों का ।

वरुण गांधी -मैं मानता हूं कि किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की इतनी बड़ी जि़म्मेदारी इस उम्र में मिलना मुश्किल काम है , मैं आभारी हूं पार्टी और हमारे बड़े नेताओं का ,जिन्होंने मुझे इस लायक समझा ।ये बात भी आपकी ठीक है कि मेरे नाम के साथ यदि गांधी नहीं जुडा होता तो मैं अभी युवा मोर्चा या प्रदेश संगठन स्तर पर होता ,

लेकिन एक बात समझिए कि इस वक्त मुल्क की 60 फीसद आबादी 35 साल से कम उम्र की है ,उनको नुमांइदगी और मौका मिलता है तो हम बेहतर परफोर्म करने की कोशिश करेंगें ।बीजेपी में इस टीम में अनुभव और जोश का सामंजस्य किया गया है ।

सवाल - क्या आपको वाकई लगता है कि बीजेपी में नौजवानों को ज़्यादा मौके मिल रहे हैं या अब आप कोशिश करेंगें ।

वरुण गांधी -मैं समझता हूं कि आज युवाओं को मौका देने की आवश्यकता है । पूरे मुल्क में युवाओं का टैलेन्ट भरा पड़ा है ,उसे पहचानना है और मौका भी देना है । उनके पास एनर्जी है, नई सोच है । जिला स्तर पर भी ऐसे कार्यकर्ता हैं जिन्हें ज़मीनी समझ है।
 मेरे पिता संजय गांधी ने 1980 में दो सौ से ज़्यादा नौजवानों को टिकट दिए थे, उनमें से आज बहुत से केन्द्रीय मंत्री, कई राज्यों के मुख्यमंत्री और सांसद हैं । मुझे लगता है कि ज्यादा से ज्यादा नौजवानों को चुनाव में टिकट देकर हिस्सेदार बनाना चाहिए पार्टी को ।

सवाल- लेकिन फायदा क्या है वरुण गांधी समेत आज ज़्यादातर नौजवान सांसद राजनीतिक परिवारों से जुड़े हुए लोग ही हैं और माफ कीजिए उनकी परफोर्मेंस निराशजनक रही है ,वे तो बुजुर्ग सांसदों की तरह फाइटर भी नहीं लगते ।

वरुण गांधी -आपकी बात कुछ हद तक इसलिए सही है कि जो लोग राजनीतिक परिवारों की वज़ह से राजनीति में आए हैं ,उनकी परफोरमेंस बहुत अच्छी नहीं रही है । इसकी एक वजह मुझे लगती है कि उन लोगों ने संघर्ष नहीं किया है और उन्हें मौका मिल गया।

 पुराने लोगों ने मेहनत और संघर्ष ले अपना मुकाम हासिल किय़ा है ,लेकिन मैं समझता हूं कि नौजवानों को मौका दिया जाना चाहिए । कुछ वक्त सफलता हाथ ना लगे तब भी , उन्हें समय दिया जाना चाहिए अपने को साबित करने का और मैं यकीन दिलाना चाहता हूं कि आप नौजवानों पर भरोसा कर सकते हैं ।

सवाल - नेहरु गांधी परिवार का नाम हमेशा कांग्रेस से जो़ड कर देखा जाता है तो आपने बीजेपी में शामिल होने का फैसला क्यों किया ।

वरुण गांधी - कांग्रेस पार्टी एक राजनीतिक दल को ही देश की तरह समझती है यानी उनके लिए कांग्रेस ही देश है , जबकि मेरी कोशिश होगी कि देश की बात बीजेपी में रखूं ।

बीजेपी की बात देश के सामने रखना तो मेरा काम है ही ,लेकिन अहम है कि देश की बात पार्टी के सामने रखी जाए कि देश क्य़ा सोचता है । उस पर हमें कैसे आगे बढ़ना है ।

सवाल- क्या आपको लगता है कि बीजेपी देश की बात को ,देश की सोच को समझती है या समझने की कोशिश करती है , आपके हिसाब से इस वक्त हमारा मुल्क क्या सोच रहा है ।
वरुण गांधी - देश में इस वक्त अलग अलग ट्रैंड्स चल रहे हैं , । चुनावों , लीडरशिप और मुद्दों रो लेकर हम स्थानीय होते जा रहे हैं यानी पूरे देश का या पूरे राज्य का एक नेता या एक सोच या फिर एक मुद्दा नहीं हैं ।

 हर जगह की अपनी ज़रुरतें हैं, मुद्दे हैं और लीडर भी हैं । हो सकता है कि जो नेता दिल्ली में बड़ा माना जाता हो, उसे मध्यप्रदेश में ज़्यादातर लोग जानते ही नहीं हों , या जो मुद्दा यूपी का है उस मुद्दे पर राजस्थान में चुनाव नहीं लड़ा जा सकता , इसलिए विकेन्द्रीकरण की ज़रुरत है , पालिटिकल डिसेन्ट्रलाइजेशन । सबकी सोच को शामिल करना होगा, सबको सुनना भी होगा ।

सवाल- क्या बीजेपी इसी रास्ते पर चल रही है ,वो तो यूनीपार्म सिविल कोड की बात करती है , फिर से धारा 370 को हटाने पर ज़ोर दे रही है ,हार्डकोर छवि के साथ जाने की तैयारी हो रही है, क्या ये सब चलेगा ।
वरुण गांधी - इस वक्त मुल्क को उदार मानसिकता की ज़रुरत है । पार्टी में आम सहमति बनाई जानी चाहिए मुद्दों पर । अलग अलग प्रदेशों में अलग अलग चेहरों को उतारा जा सकता है । अलग अलग ग्रुप्स अलग अलग मुद्दों पर काम करें । एजेन्डा बनाने में इनकी हिस्सेदारी हो तो सबकी ताकत मिलेगी और उससे जीत तय होगी ।

सवाल- यानी आप कह रहे हैं कि पार्टी या मुल्क को एक चेहरे या एक नेता के साथ चुनाव में उतरने की ज़रुरत नहीं है ।

वरुण गांधी - मैं ऐसा नहीं कह रहा । मेरी समझ से पार्टी को एक चेहरे की भी आवश्यकता है लेकिन प्रदेशों में अलग अलग चेहरों की ज़रुरत है ।पूरे देश को जीतने और समझने के लिए सिर्फ एक या दो चेहरों के साथ नहीं चला जा सकता । हर राज्य में ऐसे चेहरे मिल जाएंगे ।

हमारे यहां प्रेसिडेंशियल फार्म आफ इलेक्शन नहीं हैं जिसमें एक नेता के नाम पर चुनाव लड़ा जाए, लेकिन मैं समझता हूं कि लीडरशिप इश्यू और लोकल लीडरशिप इन दोनों के बीत कहीं रास्ता देखा जा सकता है , ये दोनों आइडिया एक दूसरे के विपरीत हैं लेकिन सचाई इन दोनों के बीच कहीं ढूंढी जा सकती है ।

सवाल - यानी मेरी समझ के हिसाब से आप आडवाणी जी की तरह सामूहिक नेतृत्व यानी कलेक्टिव लीडरशिप का वकालत कर रहे हैं ।

वरुण गांधी - बीजेपी में हमेशा ही कलेक्टिव लीडरशिप का माडल रहा है । एक या दो चेहरों के बजाय सामूहिक नेतृत्व के साथ बीजेपी चलती रही है और यहां सबके साथ मिल बैठकर फैसले होते हैं ।लेकिन ये भी सच है कि युवाओं में नरेन्द्र मोदी का क्रेज हैं । 

मोदी लोकप्रिय नेता हैं । साथ ही शिवराज सिंह मध्यप्रदेश में बेहद लोकप्रिय नेता हैं । मनोहर परिकर गोवा में काफी लोकप्रिय हैं ,उनकी अपनी ताकत है ,जनता उन्हें चाहती हैंऔर पार्टी में शस्त्र के तौर पर काम आ सकते हैं ।इन सबका सम्मान किया जाना चाहिए ।
सवाल - क्या आपको लगता है कि बीजेपी अगले चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेगी और सरकार बनाने की ताकत उसके पास होगी ।
वरुण गांधी - फिलहाल तो अकेले के दम पर पूर्ण बहुमत नहीं दिख रहा है । 1999 की तरह हम यदि 182 तक पहुंचते हैं या यूं मानिए कि 180 से 200 तक पहुंचते हैं तो सरकार बनाने की तरफ बढ़ सकते हैं । यदि उससे कम आंकड़ा होगा तो फिर मुश्किल होगी ,लेकिन मुझे भरोसा है कि हमारी ताकत बढ़ेगी और हम 200 तक पहुंच जाएंगें ,क्योंकि लोग ना केवल कांग्रेस और यूपीए से परेशान हैं बल्कि वे बीजेपी को एक बेहतर और मजबूत विकल्प के तौर पर देखते हैं ।

सवाल - बहुमत के करीब आप पहुंचते दिखते नहीं और सहयोगियों को नाराज़ कर रहे हैं ,आपके पास सहयोगी नहीं बचे जबकि आडवाणी जी एनडीए प्लस की बात करते हैं ।

वरुण गांधी -हमारे कुछ सहयोगियों के साथ मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद नहीं हैं । हमारे उनसे रिश्ते कायम हैं और हमें उम्मीद है कि वे चुनावों के बाद बीजेपी ,एनडीए के साथ फिर से जुड़ सकेंगें और उनकी मदद से सरकार बनेगी । 

एनडीए प्लस का मतलब भी ज़्यादा से ज़्यादा सहयोगियों को जोडना और मुझे लगता है कि उसमें ज़्यादा मुश्किल नहीं आएगी ।

सवाल - सहयोगियों की बात छोड़िये , बीजेपी में नेताओं में मनभेद नहीं हैं ,लगता है बीजेपी आइलैंड्स आफ इंटेलीजेंटस हैं ।

वरुण गांधी - बीजेपी में बहुत ही सशक्त और अनुभवी के साथ साथ लोकप्रिय नेता हैं । हरेक नेता की अपनी ताकत और लोकप्रियता हैं , मैं समझता हूं कि सब साथ जुड़कर किसी का भी मुकाबला कर सकते हैं ,इस टीम से जीतना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन जैसा होगा ।

सवाल- आपको लेकर भी कहा जाता है कि आप पर कई नेताओं का वरदहस्त रहा है ,किसको आप सबसे ज़्यादा श्रेय देते हैं अपने आगे बढ़ने के लिए ।
वरुण गांधी - मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे वाजपेयी जी, आडवाणी जी , गडकरी जी और राजनाथजी जैसे नेताओं का साथ मिला । सबसे काम सीखने का मौका मिला । राजनीति के पिछले दस साल में मैंने कई उतार चढ़ाव देखे हैं ,कई बार काफी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा है ।

 इस दौरान सुषमा स्वराज जी ने जिस तरह मेरी रक्षा की , मेरे लिए लड़ाई भी लड़ी ।बेटे के रुप में उन्होंने मुझे स्वीकार किया । राजनीति से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं उनका मेरे प्रति मां जैसा बर्ताव ।

सवाल - आप यूपी की नुमाइंदगी कर रहे हैं ,पार्टी ने अभी अभी महासचिव बनाया है और उसके बाद गुजरात के अमित शाह को प्रभारी बना दिया गया है जिनकी छवि हार्डकोर नेता की है , क्या आपको मुश्किलें आ रही हैं ।

वरुण गांधी - मैं अमित शाह जी को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता हूं ,लेकिन मुझे पता है कि वे संगठन में कार्यकुशल व्यक्ति हैं और जहां तक प्रभारी होने का सवाल है , मैं भी पश्चिम बंगाल का प्रभारी हूं ।

 मैं समझता हूं कि प्रभारी की ज़िम्मेदारी सहयोग और समन्वय की होती है जिसमें अमित शाह जी कुशल हैं ,इसलिए परेशानी का सवाल ही नहीं उठता ।

सवाल- लेकिन उनकी छवि हार्डकोर नेता की है तो क्या अब हार्डकोर मुद्दों पर फिर से जाएंगे आप ।
वरुण गांधी - यूपी में अभी समाजवादी पार्टी की सरकार और पिछली बीएसपी सरकार की विफलता बड़े मुद्दे हैं ,हम उनके साथ जाएंगें । जनता जातिदावदी राजनीति से ऊब चुकी है । 

अखिलेश यादव को भी जनता ने इसलिए वोट दिया था कि उनसे उम्मीद थी लेकिन अब उनकी आशा अखिलेश यादव से निराशा में बदल चुकी हैं । इसलिए धर्म और जाति से ऊपर उठकर हम आशावादी राजनीति करना चाहते हैं ।

सवाल - आखिरी सवाल , क्या अब राम मंदिर निर्माण फिर से मुद्दा होगा ।
वरुण गांधी - मंदिर निर्माण कोई मुद्दा नहीं है फिलहाल।
समाप्त, विजय त्रिवेदी

3 comments:

  1. इंटरव्यू अच्छा है लेकिन अधूरा है. जो व्यक्ति नरेंद्र मोदी से गुजरात के सवाल कर चुका और उसकी कीमत अहमदाबाद से डेढ़ सौ किलोमीटर पहले उतारे जाने के रूप में चुका चुका है वह पूरे इंटरव्यू में एक बार भी वरुण गांधी से यह क्यों नहीं पूछ पाया कि उन्होंने २००९ के लोकसभा चुनावों में जो बयान दिया था वह सही था या गलत? क्या उसके लिए उन्हें कोई मलाल है? क्या वे देश के मुसलमानों से माफी मागेंगे? क्या उन्होंने सच में अपने ऊपर दर्ज मुकदमों को खत्म करवाने के लिए गवाहों, प्रशासन और स्थानीय नेताओं को डराया-धमकाया आदि आदि...

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  2. WHY DID TRIVEDIJI WASTE HIS TIME ON A CHILDISH FELLOW.-----HE IS A POOR REPLICA OF HIS VISIONARY FATHER.

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  3. WHY DID MR TRIVEDI WASTE HIS TIME FOR AN IMMATURE FELLOW WHO HAS LEARNT NOTHING FROM THE LEGACY OF HIS VISIONARY FATHER.

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