Monday, July 29, 2013

suspension of IAS officer- जो सच बोलेंगें, मारे जाएंगे


विजय त्रिवेदी

ईमानदार अफसर हैं तो सज़ा भुगतिए
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जो सच बोलेंगे, वो मारे जाएंगें
 यूपी के ग्रेटर नोएडा की आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड करने को लेकर भले ही यूपी की आईएएस एसोसिएशन उनके समर्थन में सामने आ गई हो ,लेकिन ऐसे ईमानदार अफसरों की कहानियों की कमी नहीं है जिन्हें सरकार के गुस्से का निशाना बनना पड़ा हो ।दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड कर राजनेता ये संदेश देना चाहते हैं कि झुक जाइए, वरना .....
  

 वरना तोड़ दिये जाओगे और साथ ही अपने वोटर को ये बताना कि असली मालिक वे हीं हैं ,लेकिन जब तक बिना रीढ़ की हड्डी वाले सीनियर अफसर रहेंगें ,राजनेता ही मास्टर बने रहेंगें ।

ग्रेटर नोएडा में रेत माफिया के खिलाफ अभियान चलाने वाली दुर्गा शक्ति नागपाल को अखिलेश सरकार ने एक धार्मिक स्थल की दीवार गिराने के मामले में सस्पेंड कर दिया है ।

 अलग अलग राज्यों में इस तरह के अफसरों पर आए दिन अपने राजनीतिक आकाओं की नाराज़गी की गाज़ गिरती रहती है । इसके पहले मायावती सरकार के दौरान यूपी के एक आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को नाराज़गी झेलनी पड़ी । 18 साल में उनका 22 बार तबादला किया गया यानी एक साल भी एक पोस्ट पर वे नहीं रह पाए ।

पिछले दिनों हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका पर हुडा सरकार की नाराज़गी तब बरसी जब उन्होंने एक बिल्डर और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के बीचे हुई डील का खुलासा किया और उसकी जांच के आदेश दिए ,

तब से तो लगातार उनका तबादला हो ही रहा है ,लेकिन उससे पहले चौटाला सरकार भी उनको बर्दाश्त नहीं कर पाई थी और चौटाला सरकार के दौरान भी खेमका को लगातार एक जगह से दूसरी जगह बेवज़ह तबादले की वजह से जाना पड़ा था ।

उधर गुजरात में नरेन्द्र मोदी सरकार की नाराज़गी एक आईपीएस अफसर राहुल शर्मा को इसलिए झेलनी पड़ी क्योंकि उन्होंने गुजरात दंगों के दौरान एक भीड़ को दूसरे लमुदाय के धार्मिक स्थल पर हमला करने से रोक दिया था ।

 शर्मा तब भावनगर के एसपी होते थे , दो महीने बाद उन्हें अहमदाबाद में एक लो प्रोफाईल पोस्टिंग पर भेज दिया गया और राहुल शर्मा का पिछले 20 साल में 12 बार ट्रांसफर किया गया ।

ईमानदार अफसरों के लिए बिहार में भी कोई जगह नहीं दिखती । बिहार के एख शानदार पुलिस अफसर रहे हैं मनोज नाथ । 39 साल की नौकरी में उनका 40 बार ट्रांसफर हुआ और मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में एक साल में चार बार उन्हों जगह बदलनी पड़ी । तीन बार उनसे जूनियर अफसरों को उनके आगे कर पुलिस विभाग का मुखिया बनाया गया ।

 यानी किसी की भी सरकार रही हो ,ईमानदार अफसर बर्दाश्त नहीं है । बिहार में ही सत्येन्द्र दुबे की कहानी किसी से छिपी नहीं हैं , घोटाले सामने लाने की वजह से जिनकी नवंबर 2003 में हत्या कर दी गई ।उधर इंडियन आइल कार्पोरेशन और तेल माफिया के बीच की गड़बड़ी को ज़ाहिर करने वाले नरेन्द्र नाथ की भी हत्या कर दी गई ।


 इनके अलावा भी दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें काम करने वाले और ईमानदार लोगों को सज़ा मिली ।कवि राजेश जोशी की एक कविता याद आ रही है - जो सच बोलेंगे वो मारे जाएंगे ।
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4 comments:

  1. yani imandar logon ke liye is desh mein koi jagah nahin hai.

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  2. जाननेवाले जान जायेंगे----कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना---

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  3. http://information2media.blogspot.in/

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  4. इस तस्वीर का दूसरी पहलू यह है कि निलंबित होकर भी ईमानदार ऑफिसर जनता की नज़रों में हीरो होते हैं और नेताओं को गालियां ही मिलती है। ये और बात है कि वे सत्ता का आनंद लेते हैं।
    बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। उस कहानी का शीर्षक था - हार की जीत। जिसमें इलाके का नामी डकैत - खड़क सिंह ने बाबा भारती से उनका घोड़ा छल से छीन लिया। बाबा ने कहा कि देखो, यह घोड़ा तुम ले जाओ, लेकिन इतना याद रखना कि कल से कोई गरीबों पर विश्वास नहीं करेगा। यह बात सुनकर खड़क सिंह की आत्मा को चोट पहुंची और उसने बाबा के अस्तबल में उनका घोड़ा बांध दिया। इस तरह से बाबा हार कर भी जीत गए और खड़क सिंह जैसा नामी दुर्दांत डकैत जीतकर भी हार गया।
    यानि कहानी का मूल है कि ईमानदार लोग सदैव हमारे दिल में बसे होते हैं। लेकिन नेताओं की भगवान भी सद्बुद्धि नहीं दे सकते हैं, हम तो इंसान हैं, वे तो इस महंगाई के युग में पांच, बारह रुपये की क्या कहें 1 रुपये तक में भरपेट खाना खिलाने की बात कहते हैं और अगले दिन थूककर चाट जाते हैं। जबकि हकीकत उन्हें स्पष्ट तौर पर पता है

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