Monday, July 1, 2013

poem by Gulzar saheb,जो रिश्ते बनते थे

क़िताबें  झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,
बड़ी हसरत से तकती हैं 
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती 
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं ...

मगर वो जो उन किताबों में मिला करते थे 
सूखे फूल और महके हुए रुक्के 
क़िताबें मांगने,गिरने,उठाने के बहाने 
              जो रिश्ते बनते थे 
अब उनका क्या होगा ......।

सलाम , गुलज़ार साहेब

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