Thursday, July 4, 2013

interview wd Jean derze -वोटों की भूख से



वोटों की भूख से गरीबों की भूख मिटे तो बुरा क्या है


विजय त्रिवेदी

सोशल एक्टिविस्ट जान द्राज़...., जो समाज की गड़बड़ियों और कमज़ोरियों से ना तो घबराते हैं और ना सिर्फ आलोचना करते हैं ,लेकिन लगातार कोशिश में रहते हैं उन्हें सुधार कर समाज को रहने लायक बनाने में । द्रा़ज. यूं जन्मे तो दूरदराज़ बेल्जियम में ,लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान को ही अपना घर बना लिया ।

 यूपीए सरकार की सबसे अहम दो योजनाओं की मूल स्वप्न जान ने देखा - पहली नरेगा और दूसरी खाद्य सुरक्षा योजना यानी फूड सिक्योरिटी । इस योजना को कांग्रेस के लिए अगले आम चुनाव का सबसे अहम एजेंडा माना जा रहा है ।

सवाल - सरकार ने फूड सिक्योरिटी बिल में Priority and Genaral को हटाकर अब सबके लिए एक ही योजना कर दी है , क्या इससे ज़्यादा लोगों को फायदा हो पाएगा , या फिर सबसे गरीब यानी poorest of poor को इस वजह से पूरा अनाज नहीं मिल पाएगा ।

जान द्राज – मैं समझता हूं कि priority and general के बीच का फासला खत्म करने का फैसला एक अच्छा कदम है । ये फासला या दूरी या यूं कहे कि अंतर एपीएल APL और BPL जैसा था जिससे पहले भी काफी दिक्कतें , परेशानियां होती रही हैं ।

 वैसे भी ये अंतर व्यवहारिक नहीं है ,क्योंकि सरकार के पास अभी तक कोई ऐसा रास्ता या माध्यम नहीं दिखाई देता जिससे कि वो इस बात की पहचान कर सके कि गरीब परिवार कौन से हैं और कितने हैं , साथ ही ये समाज को बांटने वाला भी दिखता है । मेरे ख्याल से जितने ज़्यादा लोगों को जन वितरण प्रणाली या राशन व्यवस्था (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ) में शामिल किया जाएगा , उतना ही ज़्यादा दबाव सिस्टम के ठीक से काम करने पर पड़ेगा और इससे गरीब लोगों के सिस्टम से बाहर रहने का खतरा भी कम हो जाएगा ।
सवाल - राइट टू फूड के साथ न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट के लिए दालें और खाद्य तेल भी देने की ज़रुरत आप समझते हैं क्योंकि आमतौर पर इस सिस्टम में सिर्फ गैंहू, चावल या मोटा अनाज ही दिया जाता है जो नाकाफी है ।
जान द्राज- हां , हमारा पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम तभी कुपोषण को रोकने में कामयाब हो पाएगा जब कि उसमें ना केवल अनाज बांटा जाए बल्कि न्यूट्रिशनल सामान जैसे दालें और खाद्य तेल भी दिए जाएं । कुछ राज्यों ने इसे लागू भी कर दिया है और वे तेल और दालें भी राशन में दे रहे हैं ।

सवाल - ज़्यादातर लोग राइट टू फूड स्कीम को कांग्रेस के VOTE CATCHING PROGRAMME की तरह देखते हैं , क्या आपको लगता है कि यूपीए 2 इस योजना से यूपीए 3 तक पहुंच जाएगा और सरकार बना लेगी ।
जान द्राज – इस बिल से किसी को चुनावों में क्या फायदा और नुकसान होगा या इससे क्या असर पड़ेगा , इससे मेरा कोई ताल्लुक नहीं है । वैसे भी जम्हूरियत में राजनेता वोट के बारे में सोचते हैं,इसके अलावा भी उनके बहुत से मकसद होते हैं ।

 मैं समझता हूं कि उनके वोटों की भूख से गरीबों की भूख मिटे तो कोई बुरी बात नहीं है । लेकिन हम खाद्य सुरक्षा की लड़ाई मानव अधिकारों के तौर पर लड़ रहे हैं , वोट हासिल करने की योजना की तरह नहीं ।

सवाल - क्या आपको नहीं लगता कि यदि इस योजना को केवल सबसे गरीब के लिए ही रखा जाता तो बेहतर होता , सभी के लिए इसे लागू करने से टैक्सपेयर के पैसे का दुरुपयोग आप नहीं समझते ।
जान द्राज- सबसे बड़ी परेशानी की बात ये है कि सरकार के पास गरीब परिवारों का , उनकी आबादी का कोई ठीक हिसाब किताब नहीं हैं । सरकार के गरीबों की पहचान के सारे प्रयासों ने तबाही मचाई है । हिंदु्सतान के गांवों में रहने वाले आधे से ज़्यादा गरीब परिवारों के पास बीपीएल कार्ड ही नहीं हैं ।

मुझे लगता है कि योजना को सिर्फ सबसे गरीब के लिए रखने से योजना और सिस्टम को समाज का पूरा सहयोग नहीं मिल पाता और उसे ठीक से लागू करने में परेशानी होती । अभी तक का अनुभव ये है कि पीडीएस यानी राशन व्यवस्था में जितने ज़्यादा परिवारों को शामिल किया गया , उतनी ही इस योजना को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिली , बजाय इसके कि उसे सिर्फ बीपीएल तक ही सीमित रखा गया । 
 बहरहाल याद रखिए कि खाद्य सुरक्षा बिल में सबसे गरीब परिवारों के लिए अन्त्योदय योजना को जारी रखा गया है ।

सवाल - क्या आप समझते हैं कि सरकार के पास इतना पैसा है कि इस योजना को पूरी तरह से लागू किया जा सकेगा या फिर ये सिर्फ चुनावी तमाशा भर है ।
जान द्राज- इस बजट में नेशनल फूड सिक्योरिटी बिल के लिए बहुत कम पैसे का आवंटन किया गया है । मेरी नज़र से ये एक गलती है , गलत फैसला है । इस बात का कोई मायने नहीं कि बिना किसी ठोस सपोर्ट और पैसे के किसी कानून को लागू किया जाए ।

 ऐसा नहीं है कि पैसा नहीं है , रिसोर्सेज हैं , मसला सिर्फ प्राथमिकता का है । हकीकत में तो नेशनल फूड सिक्योरिटी बिल को एक बेहतर आर्थिक इन्वेस्टमेंट की तरह लिया जाना चाहिए , खासतौर से तब जबकि देश के भंडारों में अनाज लबालब भरा हुआ है ।

सवाल - आपकी बात मानें तो सबसे अहम सवाल ये है कि अभी तक गरीबों की पहचान का कोई ठीक तरीका सरकार ने नहीं निकाला है और फिर इसे राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है , आपको क्या रास्ता दिखता है ।

जान द्राज – मैं मानता हूं कि गरीब परिवारों की पहचान कर पाना सरकार के लिए मुश्किल काम है । शायद इसीलिए बिल में राशन सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले यानी बीपीएल तक ही सीमित नहीं रखा गया है ,बल्कि ज्यादा से ज्यादा परिवारों को इसमें शामिल करने की कोशिश की गई है , गांवों में तो इनकी तादाद 75 फीसद तक है ।

हालांकि ये भी यूनिवर्सल पीडीएस जैसी अच्छी नहीं है फिर भी इसमें ज़्यादा से ज़्यादा गरीबों को शामिल करने का इंतज़ाम किया गया है । एक बात और मान कर चलिए कि इससे हमारा पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम सुधरेगा और उस पर दबाव बढ़ेगा क्यों कि उसमें ज़्यादातर लोगों की हिस्सेदारी होगी , उन्हें इसका फायदा मिलेगा ।

सवाल - एक तरफ तो सरकार तेल,खाद पर से सब्सिडी में कमी की बात करती है और दूसरी तरफ इससे फूड सब्सिडी बढ़ जाएगी , इसके क्या मायने हैं और इससे क्या फायदा होगा ।
जान द्राज -मैं खाद पर सब्सिडी कम करने के खिलाफ नहीं हूं । दरअसल खाद पर सब्सिडी फूड सिक्योरिटी के नाम पर ही शुरु की गई थी,लेकिन मैं समझता हूं कि फूड सिक्योरिटी के लिए नरेगा और पीडीएस जैसे बेहतर रास्ते हैं ।

 वैसे फूड सिक्योरिटी बिल के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के लिए खाद पर सब्सिडी कम करने के बजाय और रास्ते भी हैं । जैसे टैक्स बेस को बढ़ाकर , कुछ टैक्स कटोतियों को खत्म करके और टैक्स चोरी को रोक कर भी पैसे का इंतजाम किया जा सकता है । मुझे लगता है कि यदि अमीर ठीक से अपना टैक्स अदा करें तो गरीबों के लिए काफी कुछ किया जा सकता है ।

सवाल - सरकार ने माना है कि 26 रुपए रोजाना में एक आदमी का खर्च चल सकता है । आप गरीब आदमी के बीच रहते भी हैं और उसके लिए लड़ाई भी लड़ रहे हैं , क्या ये पैसा काफी लगता है आपको ।

जान द्राज -मेरे ख्याल से कोई भी इस बात को नहीं मानेगा कि 26 रुपए रोजाना पर कोई आदमी ठीक से ज़िंदगी बसर कर सकता है ।योजना आयोग भी अपने इस बयान को ठीक से कभी जस्टिफाई नहीं कर पाया ।

इससे भी ज़्यादा हैरानी और तकलीफ देने वाली बात ये है कि योजना आयोग की इस न्यूनतम सीमा से भी नीचे करीब तीस फीसदी लोग अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं ।और इसे समझने की कोशिश की जाए कि लोग बिना किसी बड़े विरोध की इतनी मुश्किल से जी रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई और रास्ता नहीं है ।
समाप्त, विजय त्रिवेदी


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