Tuesday, July 2, 2013

hunger -मैं भी भूखा ना रहूं





विजय त्रिवेदी

मैं भी भूखा ना रहूं, साधू ना ….
स्टेंडअप कामेडियन राजू श्रीवास्तव खचाखच भरे आडिटोरियम में किस्सागोई करते हुए ज़िक्र कर रहे थे कि हमारे यहां हिंदुस्तान में शादियों और समारोहों में लोग खाने की प्लेट को रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे की तरह भर लेते हैं जिसमें दही बड़े पर गुलाबजामुन रखा हुआ है और पनीर की सब्जी के साथ रबड़ी मिली हुई है ,फिर जितना खाया खा लिया , बाकी प्लेट यूं ही भरी हुई छोड़ दी ।

आमतौर पर एक समारोह में डिनर में आजकल चालीस से पचास डिशेज होती हैं मानो पेट नहीं गोदाम हो जिसे हर किसी को भर लेना हो , फिर एक समारोह में पांच सौ से हज़ार लोग खाना खा रहे होते हैं वहां करीब एक सौ लोगों का खाना बच जाता है , जो यूं ही बेकार जाता है ,लेकिन क्या हम वाकई इस बात के लिए परेशान होते हैं ।
बहुत से लोग तो इसमें अपनी शान समझते हैं कि
 उनके समारोह में सौ लोगों का खाना तो यूं ही बच गया ,मगर वे उसे बांटते भी नहीं ।जिस दुनिया में हर सातवां आदमी रात को भूखा सो जाता हो वहां अन्न को लेकर ये रवैया इंसानी तो किसी हाल में नहीं कहा जा सकता ।
यूपीए सरकार मानसून सत्र में खाद्य सुरक्षा बिल को पास कराने की तैयारी में है जिसका फायदा करीब साठ फीसद आबादी को मिलेगा । हिंदुस्तानी संस्कृति में अन्न का आदर करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है और बड़े बुजुर्ग अक्सर थाली में पूरे भोजन को खत्म करने पर ज़ोर देते हैं ।

पिछले दिनों जयपुर में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेसी नेताओं को शादियों के भव्य समारोहों और बड़े बड़े भोज नहीं करने की चेतावनी सहित सलाह दी थी,लेकिन उसके कुछ दिन बाद दिल्ली में ही जब एक कांग्रेसी नेता के परिवार में शादी में शामिल हुआ तो वहां पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों का खाना था ।

बीजेपी के एक बहुत बड़े नेता के परिवार में शादी में तो लोगों की गिनती करना नामुमकिन था , इतनी भीड़ ज़रुर थी कि समारोह स्थल से कोई डेढ़ दो किलोमीटर दूर तक रास्ता जाम था तो ऐसे समारोहों में कितना भोजन व्यर्थ जाता होगा इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल काम नहीं हैं ।

दिल्ली में एक मित्र परिवार में शादी में सादे समारोह का आयोजन किया गया और उसमें किसी बड़े राजनेता या सेलेब्रिटी को नहीं बुलाया गया तो उनके राजस्थान से आए एक मित्र इसलिए नाराज़ हो गये कि उनका इस समारोह में आना ही व्यर्थ रहा क्योंकि वे तो आए ही इसलिए थे कि फिर घर लौटकर बता सकें कि वे कितनी बड़ी शादी में शामिल होकर आए हैं ,सारा मूड ही खराब हो गया उनका तो ।

मुबंई में एक स्वंयसेवी संगठन में काम कर रहे मित्र ने बताया कि उनका संगठन ऐसी शादियों और समारोहों के अलावा बड़े होटलों से भी रात को भोजन इकट्ठा करता है और फिर उसे अगले दिन ज़रुरतमंद लोगों के बीच बांटते हैं ।उनके मुताबिक इससे ज़्यादा सुकून उन्हें किसी काम में नहीं मिलता ।

जयपुर में एक मित्र हैं डा विवेक अग्रवाल अपने स्वंयसेवी संगठन के माध्यम से अन्नक्षेत्र कार्यक्रम चलाते हैं । उनके मुताबिक अमूमन हर शादी में से बचे हुए भोजन से वे 70 से 100 लोगों को खाना खिलाते हैं ।उनके संगठन ने ढाई साल में अब तक साढ़े सात लाख मील उपलब्ध कराए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक फार्म से प्लेट तक पहुंचने में तीस फीसदी से ज़्यादा खाद्य सामग्री बर्बाद हो जाती है जबकि दुनिया में हर सातंवा आदमी रात को भूखा सो जाता है ,दुनिया में करीब एक अरब लोग भूख से परेशान है और 2050 तक ये आबादी दो अरब को पार कर जाएगी ।

वो वक्त दूर नहीं जब हम कितना भी पैसा खर्च करेंगे ,लेकिन भोजन नहीं मिल पाएगा ।अब खेती के लिए मिलने वाली ज़मीन भी लगभग खत्म होती जा रही है ।1960 से लेकर अब तक हमनें खेती की ज़मीन को 12 फीसदी बढ़ा दिया है ,इसके लिए लगातार जंगलों की कटाई का काम चल रहा है ।

सामान को लाने ले जाने में 25 से 40 फीसद सब्जी और फल और 5से 10 फीसदी अनाज बर्बाद हो जाता है ।देश में 33 लाख किलोमीटर लंबा सड़कों का जाल है उसमें से पचास फीसद की हालत बेहद खराब है और सिर्फ 58 हज़ार 111 किलोमीटर लंबे हमारे राष्ट्रीय राजमार्ग हैं जिन पर सबसे ज़्यादा बोझ है ।

दो करोड़ 10 लाख टन अनाज इसलिए बर्बाद हो जाता है क्योंकि उसको रखने ,स्टोरेज के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं करीब 18 करोड़ टन फल और सब्जियां हमारे यहां हर साल पैदा होते हैं लेकिन केवल सवा दो करोड़ टन को रखने के लिए स्टोरेज हैं और इससे दस अरब डालर से ज़्यादा का हर साल नुकसान उठाना पड़ता है ।

अमेरिका और यूरोपिय मुल्कों में तो हर साल हर आदमी करीब सौ किलो फल,सब्जी और खाद्य सामग्री इसलिए बर्बाद कर देता है कि उनकी शक्ल थोड़ी खराब हो गई है या रंग बदल गया है ,हालांकि भारत में इस तरह की बर्बादी कम होती है ।

एक और विरोधाभास दुनिया भर में दिखाई दे रहा है कि एक तरफ करोड़ों लोगों के पास पेट भर खाने के लिए अनाज नहीं है तो दूसरी तरफ करोड़ों लोग मोटापे के शिकार हो रहे हैं और शायद कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि अब भूख से मरने वालों की तुलना में मोटापे के कारण मरने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है ।

इस वक्त दुनिया भर में 26 लाख बच्चे हर साल कुपोषण की वज़ह से मरते हैं तो मोटापे के कारण मरने वालों की तादाद तीस लाख सालाना से ज़्यादा हो गई है ।1990 में जहां कुपोषण और प्रिमेच्योर बच्चें मौत का छठा सबसे बड़ा कारण था और मोटापा नवां कारण होता था मौत का जो 2005 में बदल कर कुपोषण11वें स्थान पर पहुंच गया और मोटापा मौत की वजह के सातवें स्थान पर पहुंच गया ,क्या अब भी हम खाना बांटकर खाने को तैयार नहीं है ।
मां अक्सर एक दोहा सुनाती थी-
भगवन इतना दीजिए जा मे कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा ना रहूं , साधु ना भूखा जाए।
वसुधैव कुटुम्बकम वाले इस मुल्क में पूरे विश्व को वाकई अपना परिवार मानिए और शपथ लीजिए कि कोई भूखा ना रहे ।
समाप्त , विजय त्रिवेदी 

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