Monday, July 15, 2013

fmr CEC N Gopalaswami- exclusive intv



 

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी से खास बातचीत
खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारेंगें राजनेता

सिद्धान्त और नियमों पर चलना उनकी विशिष्ट पहचान है । बेखौफ़ प्रोफेशनल और ज़िंदगी भर राजनीतिक आकाओं यानी पालिटिकल मास्टर्स से दूरी बनाए रखने की वजह से शायद ही किसी राजनेता की कभी हिम्मत पड़ी हो कि उन्हें अपने इशारों पर चला सके या कोई नियम विरुद्ध आदेश दे सके ।चौड़े ललाट पर तिलक , कुछ खुद को सेक्यूलर ताकत मानने वालों को परेशान करता रहा और उन्हें निशाने पर बनाए रखा लेकिन उनके किसी फैसले पर अंगुली उठाने की हिम्मत नहीं हुई ।मुल्क में जम्हूरियत को मज़बूत करने में अहम हिस्सा रहे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी बंदूक के साए में चुनावों से खुश
नहीं हैं और राजनीति में अपराधीकरण को खत्म करना सबसे ज़रुरी कदम समझते हैं ।


सवाल- सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि द़ागी नेताओं यानी सांसदों और विधायकों को सदस्यता छोड़नी पड़ेगी ,आप इस फैसले को कैसे देखते हैं ।
गोपालास्वामी -सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अच्छा है लेकिन इसके साथ साथ यदि इसमें देरी करने की टैक्टिस पर कार्रवाई नहीं करेंगें तो खास नतीज़ा नहीं निकलेगा ।अभी कुछ दिनों पहले एक बड़े नेता ने स्टे करवा लिया । फैसला आने में और उस पर ऊपरी अदालत की मुहर लगने में सालों बीत जाते हैं तो किसे तकलीफ होगी । इसलिए मैं मानता हूं कि इससे राजनीति में तुरंत सुधार यानी टू मच एक्सपेक्टेशन । हो सकता है कि कुछ लोग इसे नेगेटिव व्यू कहें लेकिन सबसे पहले क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को सुधारना होगा
 वरना बात वहीं की वहीं रह जाएगी ।
सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम फैसला दिया है कि जेल में रह कर चुनाव नहीं लड़ा जा सकता , अदालत ने माना है कि जब जेल में रह कर वोट नहीं दे सकते तो चुनाव कैसे लड़ेंगे ,जबकि अभी तो बहुत से नेता जेल में रह कर ही चुनाव लड़ते और जीतते भी रहे हैं ।
गोपालास्वामी -मुझे लगता है कि इस फैसले का पालिटिकल पार्टिज़ मिसयूज कर सकती हैं , दूसरों को , अपने विरोधियों को फंसाने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा सकता है और अभी तो ये अदालत में रिव्यू पिटिशन में कितना टिक पाएगा , इस पर भी मुझे संदेह है ,ये मुझे वीक लगता है ।दूसरी बात जहां तक वोटर का सवाल है इसमें फर्क है क्योंकि जेल जाने से वोटर के वोट देने का अधिकार खत्म नहीं होता , सिर्फ वो वोट देने के लिए बाह नहीं आ सकता ,जबकि उम्मीदवार को उम्मीदवारी फार्म भरने के लिए जेल से बाहर आने की ज़रुरत नहीं है और यदि उसे रोका गया तो उसके चुनाव लड़ने का अधिकार खत्म हो जाएगा ।हां,उसे चुनाव प्रचार पर जाने के लिए इजाज़त नहीं मिलेगी ।
सवाल - इससे पहले सु्प्रीम कोर्ट की एक बैंच ने 2005 में फैसला दिया था जिसमें सांसदों को विशेषाधिकार का ज़िक्र करते हुए कहा गया था कि उन्हें दाग़ी होने पर सदस्यता छोड़ने की ज़रुरत नहीं ।
गोपालास्वामी - तब के मुक्य न्यायाधीश जस्टिस लाहोटी की बैंच के सामने ये सवाल नहीं था । सवाल था कि मेम्बर को कब तक प्रोटेक्शन दिया जा सकता है जन प्रतिनिधत्व कानून के तहत और उसमें माना गया था कि ये परमानेंट प्रोटेक्शन नहीं हैं यानी मेम्बर दाग़ी होने के बाद अपील कर दे और इस आधार पर अगला चुनाव भी लड़ना चाहे तो वो नहीं चलेगा । वैसे में समझता हूं कि दाग़ी साबित होने के बाद मेम्बर बने रहें देट इज नाट एक्सेप्टेबल ।

सवाल - पिछले आम चुनाव में देश में साढ़े चार सौ संसदीय क्षेत्रों में कम से कम एक दाग़ी उम्मीदवार था ,100 से ज़्यादा में दो और 50 में पांच से ज़्यादा दागी उम्मीदवार थे ,तो कैसे रोक पाएंगे ,बिना कानून के ।

गोपालास्वामी - पिछेल चुनाव में 543 सीटों में से 76 सांसद ऐसे जीत कर आए जिन पर गंभीर मामले हैं और उनमें दो साल से ज़्यादा की सज़ा मिल सकती है । इन 76 सांसदों में सभी पार्टी के मेम्बर होंगे यूं समझिए हर पार्टी से आठ दस मेम्बर । इनमें से बहुत से मेम्बर्स पर इस साल फैसला आ सकता है तो उससे किसी सरकार के अस्थिर होने का खतरा भी हो सकता है लेकिन पालिटिकल पार्टिज को लगता है कि सब पर फैसला तो एक साथ आएगा नहीं तो यदि एक दो सदस्यों की मेम्बरशिप खत्म भी हो गई तो कोई बड़ा नुक़सान नहीं होने वाला।

सवाल-आपने अपराधीकरण को रोकने के लिए चार्ज़शीट के बाद चुनाव लड़ने पर रोक का सुझाव दिया था , क्या हुआ उसका ।

गोपालास्वामी -मैंने ही नहीं 1998 से लेकर अब तक जितने मुख्य चुनाव आयुक्त रहें हैं ,सभी ने इस पर सरकारों को चिट्ठी लिखी है ।लेकिन कोई कुछ सुनता नहीं , कोई कार्रवाई नहीं हुई और अभी हो रही है ऐसा भी मुझे नहीं लगता । दरअसल आप उनसे कहोगे कि अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारो तो कौन मारेगा और इसके खिलाफ एक तर्क दिया जाता है कि इससे उम्मीदवार के चुनाव लड़ने का अधिकार खत्म होता है , जो सच बात नहीं हैं । ङम कहते हैं कि थोड़े वक्त के लिए लाल झंडी है कि अभी चुनाव नहीं लड़ना है और फिर क्लियर हो जाएगा तो हरी झंडी मिल जाएगी और तब आप चुनाव लड़िए कौन रोकता है ।

सवाल - चुनावों में मनी पावर को रोकने के लिए भी आपने काफी कोशिश की थी लेकिन अभी बीजेपी के एक बड़े नेता ने माना कि उन्होंने आठ करोड़ रुपए खर्च किए चुनाव में ।क्या उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए ।
गोपालास्वामी - एक आदमी ने बोल दिया , लिमिट क्रास करके तो सब खर्च करते हैं ये तो सभी जानते हैं । लिमिट का उल्लघंन खुले आम हो रहा है । कुछ लोग कहते हैं कि लिमिट हटा ही दो ,खर्च करने दो जो जितना चाहे । सवाल खर्च करने का नहीं हैं , सवाल है कि वो इतना पैसा क्यों खर्च करता है ।सब जानते हैं कि मंत्री पद पर या कोई और बड़ी कुर्सी पर बैठकर कोई क्या कर रहा है , पद का मिसयूज करके पैसा कमा रहा है । फिर वही बात कि वो जानता है कि हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम कमज़ोर है ,पहली बात तो फंसेंगें नहीं और फंस भी भी गए कभी तो सत्ता को इस्तेमाल कर निकल जाएगा । केस चल भी गया तो बरसों बरस निकल जाएंगें ,इसलिए कोई नहीं डरता ।
सवाल - तो क्या हमारे यहां कानून का कोई डर नहीं हैं या देरी है इसलिए ज़्यादा गड़बड़ हो रही है ।

गोपालास्वामी - हमारे यहां अभी मध्यप्रदेश में एक अफसर पति पत्नि के पास से तीन सौ करोड़ रुपए मिले हैं क्या कार्रवाई हो रही है ,मुझे पता नहीं । एक मामला 2003 से चल रहा है भ्रष्टाचार का ,कुछ नहीं हुआ ।अमेरिका में ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी खाली जगह पर गवर्नर बने शख्स पर पैसा लेने का मामला 2010 के आखिर में बना और 2011 के आखिर में फैसला आ गया और सज़ा हो गई ,लेकिन हमारे यहां ऐसा मुमकिन ही नहीं हैं . वो आपके राजस्थान में एक हीरो ने हिरण मार दिया 15 साल हो गए कुछ नहीं हुआ, फिर 7-8 साल पहले मोटर गाड़ी से लोगों को मार दिया बताया उस पर कुछ नहीं हुआ । कानून का डर लगना चाहिए । डर नहीं होता तो वो एक हाथ नहीं दोनों हाथ और सब तरफ से पैसा बटोरता है एक पीढ़ी के लिए नहीं दस दस पीढ़ी के लिए पैसा बनाता है , तो कैसे रुकेगा ।

सवाल - तो क्या ये माना जाए कि हिंदुस्तान में आम आदमी के लिए चुनाव लड़ना नामुमकिन सा है और बिना पैसे चुनाव जीता ही नहीं जा सकता ।एक तरफ मनी पावर , दूसरी तरफ मसल पावर , यानी या तो पैसे वाले जीतते हैं चुनाव या फिर अपराधियों का बोलबाला रहता है।
गोपालास्वामी - ये तो दिखाई देता ही है कि पैसे वाले ही चुनाव लड़ रहे हैं और वो ही जीतते है । अपराधी यानी ताकतवर लोग भी चुनावी मैदान में रहते हैं । चुनाव इतने मंहगे हो गए हैं कि बिना पैसे मुमकिन नहीं हैं ।
सवाल - यदि हमारे सांसद और विधायक अपराधी हैं , गलत तरीके से चुनाव जीतते हैं और जीत कर काम नहीं करते तो क्यों नहीं फिर राइट टू रिकाल यानी उन्हें वापस बुलाने का अधिकार का कानून बनाया जाए ताकि उनमें डर पैदा हो ।

गोपालास्वामी - राइट टू रिकाल एक काम्पलिकेटेड सिस्टम है और खासतौर से भारत जैसे बड़े मुल्क में । पिर तय करना होगा कि कब राइट टू रिकाल हो यानी दो साल बाद या ढाई साल , तीन साल बाद , फिर कैसे करेंगें यदि उसे एक हज़ार में से ढाई सौ वोट मिलें हैं तो उससे एक ज़्यादा वोट ज़रुरी है या फिर कितने फीसदी लोगों के वोट के बाद उसे वापस बुलाया जाए । उसके बजाय उनके कार्यकाल पर फिर से विचार किया जा सकता है कि क्या उसे घटाकर चार साल कर दिया जाए ।

सवाल-एक और प्रस्ताव था कि वोटिंग मशीन में नन आफ द अबोव का बटन रखा जाए यानी कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं ,उससे कोई रास्ता निकल सकता है ।
गोपालास्वामी - हां , नन आफ द अबोव की व्यवस्था रखनी चाहिए वोटिंग मशीन में । मान लीजिए दस फीसद या बीस फीसद लोग नाराज़ हैं और वो उम्मीदवार को खारिज़ करते हैं तो फिर राजनीतिक दलों को भी थोड़ी शर्म आएगी और अगले चुनाव में वे अपराधिक या दाग़ी उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारेंगे तो कुछ सुधार ज़रुर आएगा ।
सवाल - आपने लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ साथ कराने यानी साइमलटेनियस
इलेक्शन का सुझाव दिया था ,इससे चुनाव का खर्च कम हो ,क्या संभव है ऐसा हो पाना ।
गोपालास्वामी- हां , ये सुझाव भी अच्छा है कि साइमलटेनियस इलेक्शन करवाएं जाएं , इससे चुनाव खर्च ही कम होगा और व्यवस्था भी कम देखनी होगी । इसके साथ साथ यदि विधानसबा और लोकसभा की टर्म भी फिक्स कर दी जाए तो बेहतर होगा क्योंकि उससे अनिश्चतिता खत्म होगी और सरकारें अच्छा काम कर पाएंगी । उन्हें लगेगा कि इन पांच साल में कुछ करके दिखाना है वरना उन्हें लगता है कि पता नहीं कितने दिन सरकार चलेगी और उसमें बैठे ज़्यादातर लोग अपना घर भरने में लग जाते हैं ।
सवाल- लेकिन फिक्स टर्म का नुकसान ये भी तो है कि फिर सरकार में बैठे लोगों को कोई डर ही नहीं रहेगा चाहे कुछ भी करें , पांच साल तो एमपी या सरकार में बने ही रहना है ।
गोपालस्वामी - वो तो अब भी है ही , येन केन प्रकारेण पांच साल सरकार चला ही लेते हैं । सरकार को बचाने के लिए कभी किसी को खुश करते हैं तो कभी किसी दूसरे के पास जाते हैं ।कम से कम आयाराम गयाराम की राजनीति पर तो रोक लगेगी । ममता नाराज़ हो गई तो मुलायम को मनाएंगें और मुलायम नाराज़ हुए तो मायावती के पास जाएंगें , सो उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता ,लेकिन फिक्स टर्म हो जाए तो काम करने वाले लोग अच्छा परफोर्म करने की कोशिश करेंगें

सवाल - पालिटिकल पार्टिज़ चुनावों में मुफ्त चीज़ें बांटने के बड़े बड़े वादे करती हैं टीवी सैट्स से लेकर लैपटाप्स तक ,अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी आब्जेक्शन किया है क्या आप इसे बड़े पैमाने पर रिश्वत के तौर पर नहीं देखते mass bribe .
गोपालास्वामी - अब तो टीवी सैट्स और लेपटाप्स को छोड़िए मिक्सी और टी काफी मेकर तक बंटने लग गए हैं जो वादा कर दो वो कम है , टैक्सपेयर का पैसा है । एक फर्क तो हमनें ये कर दिया है कि कोई पैसा दे तो रिश्वत और सामान दे तो वादा । दूसरी बात एक , दो या चार लोगों को बांटों तो घूस और सबको बांटने का ऐलान करो तो उसे कहेंगें मेनिफेस्टो । राजनीतिक दलों को बोलिए तो वे कहेंगे कि ये तो हमने अपने मेनिफेस्टों में ही कहा है ,जनता को पसंद नहीं होता को वो हमें जिता कर नहीं भेजती ।
सवाल - आप राजनीतिक दलों में पारदर्शिता ट्रांसपेरेंसी पर ज़ोर देते रहे हैं ,लेकिन पालिटिकल पार्टिज़ राजनीतिक चंदे का हिसाब किताब देने को तैयार नहीं , क्या रास्ता है ।
गोपालास्वामी - पालिटकल पार्टिज के अंकाउट्स में ओपननेस होनी चाहिए, उसमें ट्रांसपेरेंसी ज़रुरी है उनके आडिट होने चाहिए , कहां से पैसा आया, कितना पैसा आया और किस पर खर्च हुआ ये सब जनता को जानना चाहिए, उसे पता होना चाहिए ।

सवाल- चुनाव आयोग हमेशा चुनाव सुधार पर ज़ोर देता है लेकिन ज्यादातर फैसले आयोग के पालिटिकल मास्टर्स के खिलाफ होते हैं तो क्या वे खुद अपने खिलाफ गले में घंटी बांधेंगें।

गोपालास्वामी - बिलकुल नहीं बाधेंगें, अपने गले में खुद घंटी ,और इसीलिए ऐसे सब मामलों में सारे दल एक साथ हो जाते हैं , सहमत हो जाते हैं । अब चुनावी चंदे की बात हुई तो सब दल साथ हो गे, नहीं बताना चाहते ,अपनी हिफाज़त के लिए, सब कानून कायदों को छोड़कर सब एक साथ हैं तब कोई विचारधारा आड़े नहीं आती , कोई एक दूसरे के खिलाफ नहीं बोलता ।

सवाल -चुनावों के लिए स्टेट फंडिंग की बात होती रही है , उससे कुछ फायदा होगा या वो सरकारी खर्च पर राजनीति करने जैसा काम है ।

गोपालास्वामी- मनी पावर को फेल  करने का एक ही तरीका हो सकता है स्टेट फंडिग ताकि अच्छे लोगों को मौका मिल सके । जो लोग वाकई देश की सेवा करना चाहते हैं , कुछ अच्छा करना चाहते हैं वो तब ही चुनाव लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं जबकि उन्हें स्टेट फंडिग हो ,। इस पर भी फैसला सरकार को करना है ।

सवाल - हम जम्हूरियत को बहुमत के आधार पर मानते हैं ,लेकिन हमारी चुनावी व्यवस्था में तो जिसे करीब 80 फीसदी लोग वोट नहीं देते ,वो सरकार में बैठा होता है ,एमपी बन जाता है ,क्योंकि देश की कुल आबादी के 70 फीसद वोटर हैं, उसमें से 60 फीसद वोट देते हैं जिनमें से तीस फीसद वोट हासिल करने वाला जीत जाता है ।
गोपालास्वामी- बिलकुल ठीक बात है जिसे ज़्यादातर लोगों ने रिजेक्ट किया वो एमपी बन जाता है और बहुमत का दावा करता है ,इसलिए मेरा सुझाव था कि पचास फीसद प्लस एक वोट मिलने पर ही जीता हुआ माना जाए,लेकिन ज़्यादातर लोग इसे प्रेक्टिकल नहीं मानते । हम तो सिर्फ नाम की डेमोक्रेसी चला रहे हैं ,गर्व की बात नहीं हैं । मैं तो बंदूक के साए में वोटिंग को भी ठीक नहीं मानता , हमें चुनावों में कितना पुलिस बंदोबस्त करना पड़ता है । डेमोक्रेसी के लिए गर्व की बात तो उस दिन होगा जब हम मतदान के दिन पुलिस बंदोबस्त की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी ।

समाप्त , विजय त्रिवेदी 

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