Thursday, July 25, 2013

exclusive intv wd pt Birju Maharaj- ज़िंदगी तो नाच ही है


विजय त्रिवेदी
फोटो- गणेश बिष्ट
नृत्य सम्राट पंडित बिरजू महाराज से
 ख़ास मुलाकात

ज़िंदगी तो नाच ही है 

उनकी मुस्कराहट में  नाच है , उनकी आंखों में नृत्य का भाव है , बोलते हैं तो लगता है मानो शब्द नाच रहे हों , हाथ हिलते नहीं, नाचते हैं ,
अंगुलियों में थिरकन है ,सांसों में लय है ,भाव में गीत है , मौन में संगीत है ,वो कथाकार हैं, चित्रकार हैं, संगीतकार हैं ,दुर्लभ सा कलाकार जो ज़िंदगी को भले ही नाच कहता हो ,लेकिन नाच को जिसने ज़िंदगी बना लिया ।

 परिचय के , अलंकारों के वो मोहताज नहीं ,लेकिन परिचय पूछो तो बोले- छोटी सी बांसुरी कहती है -
मैं जंगल की लाकड़ी ,नहीं कोऊ है मोल,
अधर लिपटे घनश्याम के ,भई बहुत अनमोल ।।

राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट से जुड़े पाश इलाके शाहजंहा रोड और पंडारा रोड के बीच बसी सरकारी सी कालोनी में बना सरकारी सा घर,बाहर छोटे से लान में चिड़िया फुदक रही है ,सामान्य सा ड्राइंग रुम उनकी मौजूदगी से वज़नदार हो गया है
।कथक का दूसरा नाम पंडित बिरजू महाराज ।75 साल की उम्र में भी वो ही खनक, आंखों में वो ही शरारत, मुस्कराहट में गजब का आकर्षण ।

सवाल  - आपने पूरी ज़िंदगी नाच के लिए , कथक के लिए लगा दी , क्या सिर्फ नाच, नृत्य ही ज़िंदगी है ।

बिरजू महाराज – नाच में जि़ंदगी नहीं लगा दी , जि़ंदगी तो नाच ही है ,नृत्य है , उसमे गति है , लय है ,भाव है । हर इंसान नाच रहा है । जिज्ञासा अंदर नाच रही है । बुद्धि से कलम कागज़ पर नाच रही है ,फोटोग्राफर की अंगुलिया नाच रही हैं ।

 प्रकृति , चांद , धरती ,सब कुछ गतिमान है । समुंदर की लहरों में नाच है, हवाओं से पेड़ों की डालियां , फूल नाच रहे हैं ।आनंद और खुशी है नाच , नाच है ज़िंदगी ।

सवाल  - ज़िंदगी ही नाच है तो फिर मुश्किल क्यों हैं नाच ।

बिरजू महाराज – नाच तालबद्ध होना है , ताल के मूड्स हैं , भावों के मूड्स हैं । नियमपूर्वक तालबद्ध होना नाच है ,जिसके लिए तपस्या ज़रुरी है । फूल तो हर तरफ बिखरे हुए हैं ,लेकिन अलग अलग फूलों को
चुनकर ,करीने से लगाने से गुलदस्ता बनता है तब उसमें फूलों की खूबसूरती चार गुना बढ़ जाती है ।

जो नाच सीखना चाहते हैं ,उनमें धैर्य ज़रुरी है , सिर्फ शौक से काम नहीं चलेगा ,जो तपस्या करना चाहते हैं वो ही नाच सीख सकते हैं , सिर्फ कमर हिलाना या पैर हिलाना नाच नहीं है आजकल की फिल्मों की तरह ।

सवाल - तो क्य़ा आप कह रहे हैं कि बालीवुड में जो कुछ हो रहा है वो नृत्य नहीं है ।

बिरजू महाराज – वो तो सिर्फ बेहूदापन है , रस्सियों के ऊपर नीचे
लटकना, उतरना, बेहूदा कपड़े पहनना और मटकना नाच नहीं होता ,उसमें सौंदर्य का भाव ही नहीं है । एक ज़माने तक फिल्मों में भी हीरोईन नृत्य को गंभीरता से लेती थी, मीनाकुमारी जी , वहीदा रहमान जी , उनकी एक अदा लाखों लोगों को दीवाना बना देती थी ।
 घूंघट की ओट से चेहरे की झलक ,कमाल कर देती थी , उसमें कशिश होती थी ,अब तो इतने छोटे कपड़े पहन कर नाचती हैं कि कशिश की तो जगह ही नहीं रह गई ।

सवाल - आपने भी तो फिल्मों में , बालीवुड में काम किया है , नृत्य दिए हैं ,उसमें और अब में क्या फर्क है ।

बिरजू महाराज- हां काम किया है , सत्यजीत रे साहब ने कहा था शतरंज के खिलाड़ी के लिए तो, उन्होंने कहा कि महाराज जी सिर्फ ऐसा नृत्य चाहिए जिससे देखने वाले नवाब साहब के चेहरे पर आनंद का भाव आएं ।
 देवदास में बहुत अच्छा नृत्य हुआ , हर शाट के बाद माधुरी पूछती थी कि कोई कमी तो नहीं रह गई , क्या दोबारा शाट की ज़रुरत है । अब तो कोई भी हीरोईन हो , वो समझती है कि उसने जो कर दिया , उससे बेहतर क्या हो सकता है ।और डायरेक्टर कहता है क्या बात है, बेबी ।

सवाल - लेकिन पापुलर तो बालीवुड के डांस ही है , एक डांस में हीरोईन काफी पैसा कमा लेती है ,और अब तो आइटम नंबर भी बहुत पापुलर होते हैं ।

बिरजू महाराज - वो क्या आइटम नंबर होते हैं चोली के नीचे क्या है, चोली के पीछे क्या है , सब कुछ दिखा रही है , उछल कूद रही है ,ये सब नृत्य तो नहीं है , ऐसे पैसा कमाने का भी कोई मतलब नहीं है ।

इनमें से ज़्यादातर हीरोइनों को तो नाचना ही नहीं आता ,और डायरेक्टर तो हीरोईनों को बड़ा ही नहीं होने दे रहा , कितनी बड़ी हो जाए हीरोईन , कैसी टांगे हों ,डायरेक्टर ,प्रोड्यूसर तो हीरोइन को जांघिया पहनाए रखता है,उसे बचपना नहीं भूलने दे रहे , और फिर आजकल डांस कंपीटीशन चल रहे हैं, उसमें पेरेंट्स अपनी छोटी छोटी बच्चियों से भी वो ही आइटम नंबर करवा रहे हैं , खुश हो रहे हैं ।

 बच्ची को पता नहीं कि जोबनवा क्या होता है ,लेकिन डांस कर रही है , पेरेंट्स खुश हो रहे हैं , भगवान ही मालिक है ।

सवाल - डांस कोई सीखेगा कैसे , आप तो गुरु शिष्य परपंरा चलाने वालों में से हैं और गुरु शिष्य परपंरा में तो मेरे हिसाब से द्रोणाचार्य होते हैं जो सिर्फ अर्जुन बनाते हैं एकलव्य को कौन सिखाएगा ।

बिरजू महाराज – गुरु शिष्य परपंरा ज़रुरी है ,क्योंकि कथक या कोई भी क्लासिकल आर्ट सिर्फ शौक या हाबी नहीं है , वो एक तपस्या है , उसे सीखने के लिए वक्त चाहिए,गंभीरता चाहिए और ताज़िंदगी सीखने की इच्छा ,लेकिन अब द्रोणाचार्य एकलव्य को भी सिखाते हैं ।

 हम खुद कई शहरों में जाकर कैंप लगाते हैं । कोलकाता में , मुबंई में, पटना में कई शहरों में जाकर सिखा रहे हैं,उसमें अमीर से अमीर और गरीब से गरीब सब सीख रहे हैं । दिल्ली में सास्वती जी हैं ,बहुत अच्छी कलाकार हैं ,सिखा रही हैं और इतने साल से सीख रही हैं ,सीखने का भाव हैं उनमें आज भी ।

कई दूसरे देशो में भी हमारे शिष्य हैं जो सिखा रहे हैं , दिल्ली में कलाश्रम में हम खुद और हमारे बच्चे ममताजी महाराज और दीपक जी महाराज सिखा रहे हैं ।

सवाल - इसमें तो वक्त भी बहुत लगता है , इतना समय किसके पास है , क्या कोई शार्टकट नहीं हो सकता ।
बिरजू महाराज – शार्टकट क्या हो सकता है , क्लासिकल डांस कोई फास्ट फूड नहीं है , बर्गर और नूडल्स नहीं हैं , वो स्लो फूड है रेगूलर फूड है , फास्ट फूड से नुकसान होता है , दाल रोटी चावल रोजाना खाइए कोई नुकसान नहीं होता ।

 प्रकृति के साथ चलिए ,हम तो हर भाव सिखाते हैं , कथक में कृष्ण पर बहुत कुछ है तो कृष्ण का रास ही नहीं हैं कथक. वो नृत्य में गैया चराते हैं ,दूध निकालते हैं , मखन बनाते हैं सब भाव है और ये सब कुछ सीखेंगे तो ज़िंदगी को भी समझने लगेंगे ।

 आजकल के बच्चों को तो इतना पता है कि दूध बोतल देती है गाय नहीं ,क्यांकि उन्होंने सिर्फ बोतल में ही दूध देखा है ।ज़िंदगी को सीखने के लिए वक्त चाहिए होता है महाराज ।प्रेम भाव चाहिए होता है ।

सवाल - लेकिन महाराज जी, आप का कथक तो घरानो के झगड़ों और विवादों से ही बाहर नहीं निकलता कि कौन सा घराना बेहतर है जयपुर घराना , लखनऊ घराना या फिर बनारस घराना ।

बिरजू महाराज – नहीं , मैं घरानों के विवाद में नहीं पड़ता , सब घराने अच्छा काम कर रहे हैं , अपने अपने तरीके से काम कर रहे हैं । घराना क्या होता है , अब देखिए मैं तो अमिताभ बच्चन को ही एक घराना मानता हूं ,उन्होंने जितना कुछ दिया है फिल्म इंडस्ट्री को , वो एक घराना हो गए हैं ।

 कई बड़े उस्ताद है जिनका नाम लेना ठीक नहीं होगा,लेकिन उनके बच्चे नालायक हो गए हैं या कुछ नहीं कर रहे हैं तो फिर उनके घराना होने का क्या मायने । वैसे कहते हैं कि जिस घर में चार पुश्ते एक ही कला पर बेहतर काम करें तो वो घराना हो गया , लेकिन अब मेरी एक शागिर्द है अमेरिका में , वो कथक सिखा रही है वहां ,बहुत अच्छा काम कर रही है , तो वो खुद एक घराना हो गई ।

सवाल - आप कथक में किसी भी फ्यूजन या बदलाव को पसंद नहीं करते ,लेकिन आजकल कथक योगा चल रहा हैं ,कुछ लोग कुछ और फ्यूजन कर रहे हैं ।

बिरजू महाराज – हमें तो फ्यूजन या कुछ और बदलाव अच्छा नहीं लगता , कथक योगा क्या है , महाराज जी, कथक में तो योगा शामिल है , सारे मूवमेंट , सारे भाव में योगा शामिल है, योग मुद्राएं कथक में होती ही हैं ,अब आप बेचने के लिए अलग सा बोर्ड लगा लो तो क्या ,कथक योगा बनाने की ज़रुरत कहां है , कथक में ताल साधना करते हैं , तो ज़ाहिर करने की ज़रुरत क्या है ,इसका कोई मतलब नहीं है ।

सवाल - आपके कुछ शिष्य भी आपसे अलग तो हो गए हैं लेकिन आपके नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं , आप रोकते नहीं उन्हें ।
बिरजू महाराज – ठीक बात है , कुछ लोगों ने अलग बोर्ड लगाकर शुरु कर लिया है , बोर्ड पर नाम लगा रहा है बिरजू महाराज परपंरा . बिरजू महाराज ने तो कोई परपंरा शुरु नहीं की , हमने कलाश्रम शुरु किया है ,उसमें भी बिरजू महाराज का नाम नहीं है ,तो अब लोग बोर्ड लगाकर कुछ भी शुरु कर लें तो क्या कहा जाए ।

सवाल - आप बहुत कम उम्र में ही नृत्य सिखाने लग गए थे और अब 1998 में रिटायर होने के बाद भी सिखा रहे हैं ,कब तक सिखाते रहेंगें.

बिरजू महाराज – मैंने आठ नौ साल की उम्र में ही दिल्ली में परफोरमेंस दी थी दिल्ली जुबली हाल में , उसके बाद सिखाना शुरु कर दिया था , पहले पिताजी अच्छन महाराज से ,फिर चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज से तालीम पाई ।

 हमारे दोनों चाचा अभिनय में माहिर रहे तो पिताजी रिदम और बंदिशों पर ज़ोर देते थे । चाचा बचपन में ही मेरी बहुत तारीफ करते थे, अपने शिष्यों को कहते देख ,ये कितनी छोटी उमर में बहुत अच्छा नाच रहा है । सब बिरजू बेटा ,बिरजूवा बुलाते प्यार से , पहले तो नाम था बृज मोहन नाथ मिश्रा, वो नाम भी ऐसे पड़ा कि जिस अस्पताल में मैं पैदा हुआ, उस वक्त वहां सब लड़कियां ही लड़कियां पैदा हुई , जब मैं पैदा हुआ तो कहा कि सारी गोपियों के बीच ये मोहन पैदा हुआ है बृज का मोहन,लेकिन घर में सब बिरजू ही बुलाते थे । 

सब बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद है कि कुछ कर पा रहे हैं , हमनें पैसा भले ही बहुत नहीं कमाया हो ,लेकिन आशीर्वाद बहुत कमाया है और उसी का पुण्य प्रताप से चल रहा है । रिटायर होने की तो कोई बात नहीं, जब तक है जान, नाचता रहूंगा ,सिखाता रहूंगा ।

सवाल - आपको इतना लंबा अरसा हो गया , 1986 में पद्म विभूषण से सम्मानित भी हो गए, लेकिन आपको भारत रत्न नहीं मिला , क्या इसकी तकलीफ नहीं है आपको ।

बिरजू महाराज  - तकलीफ काहे की , सच बताए हमें तो ये पता भी नहीं था कि ये पदम विभूषण क्या होता है , पदम श्री से बड़ा होता है , छोटा होता है , पहले जब पदम श्री के लिए कमिश्नर का फोन आया तो हमनें उनसे कहा कि भैया, हमारे चाचा हमसे बड़े कलाकार हैं , अभी आपने उन्हें नहीं दिया तो हम कैसे ले लें , तब हमारी अम्मा बड़ी आंसू भर भर रोई थी कि उनका लल्ला अभी ऐसा है जो बड़ो का ध्यान रखता है । 

फिर जब पदम विभूषण के लिए राष्ट्रपति भवन से शायद फोन आया था तो हमने कहा कि पूछ कर बताएंगे ,हमें ज्ञान नहीं था , सास्वती जी को बताया , दो तीन दोस्तों से पूछा तब हां कह दिया । और सच बताए , अब तो हमारे पास वो क्या कहते हैं फोटो वाला फ्रेम भी नहीं हैं जिसमें सब कुछ लिखा होता है , कहीं  खो गया है , वो तमगा ज़रुर रखा है , सो प्रभू की कृपा ही बहुत है ,अब आप दिलवा दो , दिलवा दो , वरना हमें क्या करना है भारत रत्न से ।

सवाल - लेकिन आपके बराबर के ही कलाकारों में पंडित रविशंकर जी, भीमसेन जोशी जी, सुब्बा लक्ष्मी जी, उस्ताद बिस्मिल्ला खान साहब सब को तो मिल गया है भारत रत्न , आपको क्यों नहीं , क्या कथक एक बेहतर कला नहीं है या फिर आप ।

बिरजू महाराज- बहुत अच्छी बात है ना,उन सब को मिला है , पंडित भीमसेन जोशी के वक्त तो साठे साहब आए ते मेरे पास पूछने , मैंने कहा कि ज़रुर दीजिए उनको ,उनको मिलना चाहिए,लेकिन एक तकलीफ होती है ,इतना देर से क्यों देते हैं मरणोपरांत, या बिस्मिल्ला खान साहब बहुत बीमार थे तब मिला ।

 मैं तो कोई उम्मीद नहीं कर रहा ,सरकार को देना होगा तो दे देगी । हम तो जो भी सम्मान मिलता है वो आज भी पिताजी की तस्वीर के आगे रख देते हैं कि संभालिए, अब हम फ्री हो गए हैं , अब आगे का काम करेंगे ।

 वैसे अब आजकल तो सब जगह ऐसी कमेटियां बन गई हैं जिनकों खुद पता नहीं कला के बारे में ,संगीत के बारे , वो लोग फैसला करते हैं , खैर छोड़ों , हम तो वैसे ही बहुत खुश हैं , देखने वालों को बहुत प्यार है देश में भी विदेश में भी और ऊपर वाले की बहुत मेहरबानी रही है , सो कुछ नहीं चाहिए ।

चलते चलते आखिरी सवाल , बिरजू महाराज , कथक और कृष्ण क्या एक ही हैं .
बिरजू महाराज- अपनी लिखी दो लाइनें सुना देता हूं -
श्याम की हर श्वांस में राधा बसी है ,
श्वांस को पाकर ये बंसी बज उठी है ,
कौन कह सकता है कि प्यारी कौन है ,
प्रीत कान्हा डोर में दोनो बंधी हैं ।।
समाप्त, विजय त्रिवेदी 

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