Monday, July 22, 2013


विजय त्रिवेदी
अहमदाबाद की अमरीन हिमानी से खास बातचीत

चिड़िया नहीं, खु़द को बाज़ मानिए

लड़की है तो क्या हुआ, आर्थिक तौर पर कमज़ोर है तो क्या, पिछड़े इलाके में रहती है तो क्या फर्क पड़ता है , मां बाप ठेला चलाते हैं तो उससे क्या हुआ 

।उसे सपने देखने से कौन रोक सकता है ,सपनों की उड़ान भरने से, पंख फैलाने से कोई रोके भी तो क्या , जब तय कर लिया तो फिर सपने पूरे होकर ही रहते हैं क्योंकि फाइटर हमेशा जीतता है । कोई डर उसे रोक नहीं सकता क्योंकि डर के आगे जीत है ।

 कुछ लोग उसे चिड़िया समझते रहे होंगें ,लेकिन वो तो उड़ती गई अपने
सपनों के लिए आसमान की ऊंचाई नापने के लिए, क्योंकि अमरीन का तो मतलब ही आसमां होता है और एक मायने होता है खुशबू सो वो खुशबू बन कर महक रही है 


।अमरीन हिमानी ,एक ही बार में सीए के इम्तिहान को पार करने वाली अहमदाबाद की 21 साल की अमरीन । गुजराती अस्मिता की अमरीन ...
सवाल -विरोधाभास नहीं लगता सीए बन कर । आर्थिक तंगी से गुजरते बचपन से निकल कर लाखों करोड़ों के हिसाब किताब वाले प्रोफेशन चार्टेड अकांउटेंट बनना ।

अमरीन – बिलकुल नहीं । असल में जिस बंदे को पैसे की अहमियत पता है । एक एक पैसे की कीमत का अहसास है , उसे कैसे इस्तेमाल करना चाहिए,कब, कहां खर्च करना चाहिए, समझ आता हो उसके लिए तो चार्टेड अकाउंटेंट बनना ज़्यादा अहम भी है और काम का भी . अब जहां भी , जिस भी संस्थान में रहूंगीं , काम करुंगी वहां बारीकी से देख और समझ पाऊंगी कि पैसे का सही इस्तेमाल हो पा रहा है या नहीं और ये देश को आगे बढ़ाने के लिए भी ज़रुरी है ।

सवाल- क्या आपके मम्मी पापा को समझ आ गया है कि आपने क्या कामयाबी हासिल की है और वो इसे कैसे देख रहे हैं ।


अमरीन- मम्मी पापा को नहीं पता है कि सीए क्या होता है ,लेकिन बहुत खुश हैं .उन्हें समझ आता है कि जो मैं बनना चाहती थी ,जिसके लिए मेहनत कर रही थी , वो मुझे मिल गया है ,इसलिए बहुत खुश हैं और उन्होंनें मुझे कभी रोका नहीं ।

 अपनी गरीबी के बाद भी नहीं , ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं होने के बावज़ूद । मेरी शादी के लिए एक एक करके जमा किए गए पैसे को मेरी पढ़ाई पर खर्च करके ।

सवाल - कितना मुश्किल रहा ये सफर , क्या माता पिता ने मदद की या फिर विरोध किया पढ़ाई का ।

अमरीन – आसानी से तो कुछ भी नहीं मिलता । मेरे मम्मी पापा अहमदाबाद के वासाणा इलाके में ठेला लगाते हैं इमिटेशन ज्वैलरी जेसे छोटे सामान का , बिंदी, मंगलसूत्र, टाप्स और ऐसी ही छोटी छोटी चीज़ें । दोनों लोग बैठते हैं वहां पर और मैं भी जाती हूं ,क्योंकि त्यौहारों और शादियों के सीजन में जब ज़्यादा काम होता है तब मैं भी बैठती हूं ।

 तीन बहनों में सबसे छोटी । दो बड़ी बहनों की शादी तो हो गई लेकिन एक वापस घर आ गई तलाक के बाद । जुहापुरा में एक बैडरुम वाला छोटा सा फ्लैट है लेकिन उसमें पढ़ाई नहीं हो सकती तो मेरी पढ़ाई के लिए खुद का छोटा घर छोड़कर किराए पर थोड़ा बड़ा घर ले लिया ताकि मुझे अलग कमरा मिल सके पढ़ने के लिए।

 पैसा ढाई गुना बढ़ गया , हमने अपना घर किराए पर दिया तीन हज़ार में और अब आठ हज़ार से ज़्यादा के घर में रहते हैं ।

सवाल - कोचिंग वगैरहा में भी तो बहुत पैसा खर्च हुआ होगा , वो पैसा कहां से आया ।
अमरीन - कोचिंग तक जाने के लिए अपनी जमा पूंजी में से स्कूटी दिला कर , रोजाना की कमाई से खर्च चलाने के बाद भी उन्होंने कभी नहीं पूछा कि मेरे पेट्रोल पर कितना पैसा खर्च होता है और मैंने कोचिंग के लिए एजूकेशन लोन लिया जिसे मैं काम शुरु करने पर थोड़ा थोड़ा करके चुका दूंगी ।

 डेढ़ लाख रुपए का कर्ज़ा है । फिर मैंने जो कोचिंग इंस्टीट्यूट ज्वाइन किया , उन्होंने कहा कि अच्छा करोगी तो स्कालरशिप मिल जाएगी और मुझे मिल भी गई स्कालरशिप । दसवीं और 12 वीं में स्कूल में फर्स्ट आई थी और यहां सीए में भी तीनों इम्तिहान पहली ही कोशिश में पार कर लिए, सो सबको बहुत अच्छा लग रहा है ।

सवाल - आमतौर पर सीए बनने का सपना तो बहुत कम लोग देखते हैं क्या आपको पता था पहले सीए के बारे में ।
अमरीन – नहीं , मेरा सपना तो था डाक्टर बनने का ,दसवीं में रिजल्ट भी काफी अच्छा रहा था ,लेकिन घर के आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि मैं मेडिकल की पढ़ाई के लिए खर्च निकाल पाती तो मैंने 12वीं के लिए कामर्स सब्जेक्ट ले लिया और उसके बाद से तय किया सीए बनने का

सीए का सपना देखने लगी और लग गई सपने को हकीकत में बदलने में , मां बाप ने अपनी ज़रुरतों को दरकिनार कर मेरे सपनों को अपना सपना बना लिया ।

सवाल- लेकिन लड़कियों का सपने देखना तो आमतौर पर गुनाह जैसा लगता है , ना तो कोई उन्हें सपने देखने की इजाज़त देता है और आमतौर पर ना ही वो सपने देखने की हिम्मत करती है ।

अमरीन – हां , बिलकुल ठीक बात है , ज़्यादातर मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास में तो ऐसा ही होता है कि लड़कियों को कहा जाता है कि ज़्यादा सपने मत देखो और खुद लड़कियां भी सपने नहीं देखती ,लेकिन मैं कहती हूं कि सपना देखना चाहिए, ज़रुर देखना चाहिए

 क्योंकि जब तक बड़ा सपना नहीं देखोगे ,उसे साकार करने के लिए कुछ करोगे कैसे और उसके बिना आगे कैसे बढ़ोगे तो लड़कियों को कहती हूं कि सपने देखो और माता पिता को कहना चाहती हूं कि अपने बच्चों को सपना देखने दें ,उसमें उनकी मदद करें कि बच्चे अपने सपनों को सच कर पाएं ।

सवाल - लोग तो कहते हैं कि इतनी सी चिड़िया और सपने आसमान के, कैसे पूरे होंगे ।

अमरीन - चिड़िया मानोगे तो दिक्कत आएगी , खुद को बाज़ मानो, फिर बाज़ समझ कर ताकत की आज़माइश करो , फिर ऊंचा सपना देखोगी , आसमान उड़ोगी तो कौन रोकेगा, कौन रोक सकता है , इसलिए खुद को छोटी सी चिड़िया मत समझो और ऊंची उड़ान के लिए मन बनाओ, ताकत लगाओ ।

लड़कियों का पढ़ना और आगे बढ़ना तो बहुत ज़रुरी है क्योंकि लड़कियां तो पढ़ती हैं तो अगली जेनरेशन भी आगे बढ़ जाती है अपने आप ।कहते हैं ना कि एक लड़की के पढ़ने का मतलब है एक पीढ़ी, एक परिवार का पढ़ना और आगे बढ़ना ।

सवाल - परेशानी दरअसल है कहां , लड़कियों के साथ , पेरेन्ट्स के साथ या फिर सोसायटी और सरकार के स्तर पर ।

अमरीन- मुझे लगता है हर स्तर पर कुछ ना कुछ गड़बड़ है । पहले तो लड़कियां घबराती है । फिर पेरेन्टस आगे नहीं बढ़ने देते । अब आगे बढ़ रहे हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा ग्रेजूएशन करा देते हैं , फिर कहते हैं कि शादी प्राथमिकता है , जो पैसा जोड़ा है वो भी लड़की की शादी के लिए है यदि उस पैसे से लड़की को अपने पैरों पर खड़ा करेंगें तो फिर कोई परेशानी नहीं होगी ।

 सोसायटी को भी लड़कियों को आगे बढ़ाने में सामने आना चाहिए । लड़कियों पर सवाल खड़े करने के बजाए उनकी मदद के जवाब ढूंढिये । सरकार आगे आने लगी है , एजूकेशन लोन जैसे सिस्टम से भी काफी मदद मिल रही है , लड़कियों के कालेजों और दूसरे संस्थानों की वजह से रास्ते खुलने लगे हैं ,लेकिन बाधाएं अभी बहुत हैं ।

सवाल - डर आगे बढ़ने से नहीं फेल होने से लगता है , लड़कियों और समाज के कमज़ोर तबके के बच्चों को डर लगता है कि फेल हो गए तो क्या होगा ।

अमरीन – फेल होने से ना तो डरने की ज़रुरत है और ना ही फेलियर से पीछे हटना चाहिए । सफलता का रास्ता तो फेल होने के बीच से ही निकलता है । फेल नहीं होने की गारंटी तो सिर्फ वे लोग दे सकते हैं जो कोशिश नहीं करते या रिस्क नहीं लेते । जो कुछ करना चाहता है उसे तो फेल होने से डरना ही नहीं चाहिए । फेल होना कोई बुरी बात नहीं है ।

सवाल - आप अहमदाबाद में रहती हैं , देश भर में ज़्यादातर लोग आजकल गुजरात को साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील प्रदेश मानते हैं , क्या आप भी ऐसा महसूस करती हैं ।

अमरीन- नहीं ऐसा नहीं हैं । हम लोग अहमदाबाद के मुस्लिम इलाके जुहापुरा में रहते हैं और ठेला हिंदू इलाके वासणा में लगाते हैं । मैं कोचिंग इंस्टीट्यूट में भी जाती रही हूं , कहीं कोई ऐसी परेशानी सामने नहीं आई ।

 वैसे हर इलाके में कुछ ना कुछ लोग ऐसे होते हैं तो ये समस्या लोगों की है ,इसे सबके साथ मत जो़डिए ।सारे लोग एक तरह से नहीं सोचते हैं ।

सवाल - क्या आप धर्म को मानती हैं और आपको लगता है कि धर्म से साम्प्रदायिकता बढ़ती है ।
अमरीन – मैं समझती हूं कि हिंदू मुस्लिम कोई भी हो उसको अपना धर्म मानना चाहिए और दूसरे के धर्म को लेकर ना तो दखल देना चाहिए ना ही कोई कमेंट करना चाहिए । मैं तो खुदा में भरोसा करती हूं ।

सवाल - आपके गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को आजकल पीएम पद का दावेदार बनाने की चर्चा चल रही है , क्या आपको अच्छा लगेगा कि आपके राज्य का नेता पीएम बने ।

अमरीन – पालिटिक्स के बारे में में ज़्यादा नहीं जानती और कुछ बोलना ठीक नहीं समझती । वैसे हरेक को पीएम बनने का अधिकार है ना ।
समाप्त , विजय त्रिवेदी

सौजन्य- राजस्थान पत्रिका 




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