Friday, June 28, 2013

poem- झाडू जाग जाती है


                   एक खूबसूरत कविता याद आ रही है -

झाडू बहुत सुबह जाग जाती है 
और शुरु कर देती है अपना काम,
बुहारते हुए अपनी अटपटी भाषा में ,
वो लगातार बड़बड़ाती है ,
                    कचरा बुहारने की चीज़ है,घबराने की नहीं 
                    कि अब भी बनाई जा सकती है ,
                    जगह, रहने के लायक।।

3 comments:

  1. अब भी बनाई जा सकती है ,
    जगह, रहने के लायक
    Bahut badhiyaa.

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  2. अब भी बनाई जा सकती है ,
    जगह, रहने के लायक
    Bahut badhiyaa.

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  3. और झाड़ू हर बुहारने वाले के साथ निरंतर बक बक जारी रखती है
    मानो वह कहती है अपनी बड़बड़ाहट में
    मै तो थकती नहीं-तुम क्यों थक जाते हो ,घबराते हो -- क्योकि
    कचरा बुहारने की चीज़ है,घबराने की नहीं

    कि अब भी बनाई जा सकती है ,

    जगह, रहने के लायक।।

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