Tuesday, June 18, 2013

बिहार ने फिर रोका बीजेपी का रथ

विजय त्रिवेदी

एनडीए के सेक्यूलर चेहरे पर सवाल,
दोस्त मिलने में आएगी मुश्किल

23साल बाद एक बार फिर बिहार ने बीजेपी के साम्प्रदायिकता के रथ को आगे बढ़ने से रोक दिया,लेकिन इस बार जब जनता दल यूनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी को रोकने का फैसला किया तब बीजेपी के महारथी नरेन्द्र मोदी रथ पर सिर्फ चढ़ने की तैयारी कर रहे थे ।

इससे पहले 23 अक्टूबर 1990 को लालू यादव ने आडवाणी के राम जन्मभूमि आंदोलन का रथ तब रोका था जब वे कई राज्यों की यात्रा करके समस्तीपुर पहुंचे थे ।

उसका नतीजा ये रहा कि आडवाणी का रथ भले ही रुक गया ,लेकिन उसकी आंधी नहीं
रुक पाई थी,शायद इसी को ध्यान में रखते हुए नीतीश ने जल्दबाजी दिखाई ।

आडवाणी का रथ रोकने से वी पी सिंह की सरकार गिर गई थी तो मोदी को रोकने की कोशिश में बीजेपी- जेडीयू दोस्ती टूट गई और बीजेपी को सरकार से बाहर होना पड़ा ।

राम रथ यात्रा के बाद बीजेपी का ग्राफ तो लगातार बढ़ता गया ,लेकिन उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता सगातार कम होती गई और वो अछूत पार्टी इस हद तक बन गई कि 1996 में वाजपेयी की सरकार 13 दिन में ही गिर गई ।

शायद यही चिंता लालकृष्ण आडवाणी ने राजनाथ सिंह को ज़ाहिर की । आडवाणी जानते हैं कि मोदी से बीजेपी का वोट और सीटें कुछ हद तक भले ही बढ़ जाएं लेकिन बिना किसी गठबंधन के केन्द्र में सरकार बनाना मुमकिन नहीं है । विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी गठबंधन टूटने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है ।

नीतीश कुमार के इस फैसले से बिहार में 17 साल पुरानी बीजेपी -जेडीयू की दोस्ती टूट गई , साथ ही 15 साल पुराने एनडीए के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया है । दोस्ती तोड़ने के साथ शरद यादव ने अपने एनडीए के संयोजक पद से इस्तीफा देने का भी ऐलान कर दिया ।

अहम बात ये है कि एनडीए के संयोजक शरद यादव और अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी दोनों ही अपनी अपनी पार्टी में हाशिये पर आ गए, इसलिए उनके ना चाहते हुए भी ये गठबंधन टूट गया । हकीकत ये भी है कि दोनों नेताओं ने गठबंधन को बचाने के लिए एनडीए में शामिल दलों की कोई आपात बैठक भी नहीं बुलाई ।

गठबंधन टूटने के बाद आडवाणी ने बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से फोन पर बात कर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की और कहा बताया कि यदि गोवा की राष्ट्रीय कार्यसमिति में मोदी को कैम्पेन कमेटी का चैयरमैन बनाने का फैसला नहीं होता तो ये दोस्ती नहीं टूटती ।

एनडीए में शामिल दल शिवसेना, अकाली दल आदि ने भी गठबंधन को बचाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की ।वैसे एनडीए गठबंधन बनाने वाले दोनों नेता वाजपेयी और जार्ज फर्नाडिस इस वक्त सक्रिय नहीं हैं ,उनकी जगह आडवाणी और शरद यादव ने ली है ।

गठबंधन टूटने से जहां बीजेपी का मुल्क के दूसरे दलों के साथ दोस्ती का दायरा कम होगा ,वहीं नीतीश कुमार ने मौजूदा गैर कांग्रेसवाद और यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल को कमज़ोर कर दिया है ।

अब ज़्यादातर दलों की लड़ाई साम्प्रदायिकता बनाम भ्रष्टाचार को लेकर होगी और इसके साथ ही एक और मोर्चा बनने की संभावनाएं बढ़ गई हैं जिसमें सभी गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस दल एक छत के नीचे आ सकते हैं ।

मोदी को नीतीश कुमार के जाने के बाद जयललिता पर भरोसा है लेकिन 1999 में वाजपेयी सरकार जयललिता के एनडीए से बाहर निकलने की वज़ह से ही संकट में आई थी । आडवाणी के बीजेपी में किनारे होने और शरद यादव के इस्तीफा देने से एनडीए के कुनबे के बढ़ने की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी । 

नीतीश कुमार ने मोदी के बढ़ते कद की वजह से दोस्ती तोड़ी हो,लेकिन उन्होंने एक बार भी मोदी का ज़िक्र नहीं किया और एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि -समझने वाले समझ गए,जो ना समझे वो अनाड़ी है ।

3 comments:

  1. सब सेकुलर-सेकुलर खेल रहे हैं।

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  2. RAJASTHANI KEE EK KAHAWAT HAI KI --AISE SUHAG SE RANDAPA ACHHA. NITISH JAISEE BEWAFA JORU EK DIN TO BHAGNI HI THI-- USKA GAM KYA. KAMSE KAM BHAJPA KHUL KAR TO KHEL SAKEGI.

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  3. so true political travel of SAJHA party.

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