Thursday, June 27, 2013

हां, मैं क्रेजी हूं ,arunima sinha


    हांमैं  क्रेजी  हूं …..

नकली पैर और असली जज़्बे के साथ एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला अरुणिमा सिन्हा

एक मित्र ने जयपुर से फोन करके कहा कि ज़िंदगी में सिर्फ क्रेजी लोग ही कुछ सकते हैं ,जिन्हें हम लोग आमतौर पर मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में मेंटल कहते है,वरना आम लोग तो सिर्फ जीते हैं और मरते हैं ,और मुलाकात हो गई एक ऐसे ही मेंटल से , क्रेजी से ,जिसे लोग वाकई कह रहे थे कि पागल हो गई हो क्या,

मुझे भी लगा कि उनके फैसले करने की हिम्मत और जज़्बा तो बिना पागलपन के हर्गिज़ हो ही नहीं सकता ,जब तक कि ऐसी जिद ना हो कि चाहिए ही चाहिए ।बमुश्किल ऐसे पागल लोगों से मुलाकात हो पाती है ।एक नकली पैर के साथ माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली अरुणिमा सिन्हा ।

सवाल-अरुणिमा तुम तो इतना ऊपर चढ़ गई हो कि कहां से शुरु करें बात , एक पैर के साथ पूरा पहाड़ चढ़ गई और वो भी माउंट एवरेस्ट,पागल हो गई हो क्या ।


अरुणिमा-(एक ज़ोरदार सा ठहाका) आप सही कह रहे हैं , पहले लोग भी यही कह रहे थे , जिसने सुना वो एक ही बात बोला कि पागल हो गई हो क्या ,लेकिन ये पागल होने की बात एवरेस्ट चढ़ने के बाद नहीं हुई , इसके बारे में सोचने के साथ हुई ।दिल्ली के एम्स हास्पिटल के बैड पर पड़े पड़े बस बेचारी शब्द सुन रही थी ।

डाक्टरों ने एक पैर काट दिया था और मैं बैड पर लेटे लेटे इस बेचारगी से तंग आगई थी तो तय कर लिया कि इस बेचारगी को तोड़ना है , जिद कर ली कि पहाड़ पर चढ़ना है ।कोई हंसा, किसी ने पागल कहा ,किसी ने समझाइश दी ,मगर मैंने तो तय कर लिया था कि पीछे नहीं हटूंगी ।

सवाल-जब तुमने बताया कि अस्पताल के बैड पर लेटी ये लड़की अब पहाड़ चढ़ना चाहती है तो क्या रिएक्शन था।



अरुणिमा -सबसे पहले मां को बताया था , मां ने समझाने की कोशिश की कि कैसे मुमकिन हो पाएगा , फिर भाई को बताया , भाई तैयार हो गया ,लेकिन बाकी लोगों का एक ही रिएक्शन था कि पागल हो गई हो क्या , अभी तो सीधे चल भी पाओगी या नहीं , इसका भी पता नहीं और तुम पहाड़ पर चढ़ने की बात कर रही हो , मगर भाई ने बहुत साथ दिया और हौसला बढ़ाया ।

सवाल - कैसे मुमकिन हो पाया ये सब , क्या आसान था ये सफर , किसने इस सफर को तुम्हारे लिए आसान बनाने में मदद की ।
अरुणिमा- भाई तो सबसे पहले तैयार हुआ और उन्होंने हर कदम पर मेरी मदद की और प्रेरणा जगाते रहे , एक बार भी ना नहीं किया उन्होंनें । फिर शुरु हुई मशक्कत बछेन्द्री पाल से मिलने के लिए, उनका फोन नंबर मिलने में ही बहुत मुश्किल हुई।

जब बछेन्द्री से मुलाकात हुई तो उन्होंने हौसला बढ़ाया और मुझमें विश्वास जाहिर किया । वो हरदम कहती रहती थी कि तू मेरी शेरनी है , मुझे पता है तू कर लेगी ।टाटा इ्ंस्टीटूयूट ने पूरी मदद की ,वरना ये सब करने के लिए मेरे पास पैसा कहां था ।

सवाल - ट्रैन में लुटेरों ने तुम्हें लूटने की कोशिश की ,फिर धक्का दे दिया और पटरी पर आती दूसरी गाड़ी की वज़ह से तुम्हारा पैर काटना पड़ा , उसके बाद मांउट एवरेस्ट चढ़ने की सोचना ,कैसे मुमकिन हुआ, मुझे भी तुम पागल लगती हो ।

अरुणिमा- हां, पागल तो हूं ही मैं । अस्पताल के बैड पर बेचारगी के बाद जिद पकड़ ली । पहाड़ इसलिए क्योंकि इसमें आप प्लेयर भी हो , स्पेक्टटेर भी हो और चीयरलीडर भी खुद ही हो ,दूसरा पहाड़ पर गल्ती सुधारने का मौका नहीं मिलता , एक गलती होती है ज़िंदगी और मौत के बीच , तो रिस्क बहुत है ।

मैं समझती हूं कि ऐसे काम के लिए जिद बहुत ज़रुरी है । फर्क आता है खुद के जुनून को बाहर निकालने से , उसे खोदना पड़ता है और खोजना भी पड़ता है खुद के भीतर ,हरेक के भीतर एक एवरेस्ट होता है ,बाहर के एवरेस्ट से पहले अंदर के एवरेस्ट पर फतह पाना होता है ।

सपना तो सभी देखते हैं ,लेकिन ऐसा मुकाम हासिल करने के लिए ऐसा सपना देखना होता है जो आपको सोने ही ना दे , जागते सोते हर पल बस सपना हो आपकी आंखों में ।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जब तय किया उसके बाद तो शायद सो ही नहीं पाई. हर वक्त आंखों में सिर्फ एवरेस्ट था ।


सवाल- सरकार का रवैया भी तो बहुत अच्छा नहीं रहा आपको लेकर, पहले 20 हज़ार रुपए मुआवज़ा दिया, फिर दबाव के बाद दो लाख कर दिया और क्या मदद रही सरकार की ।
अरुणिमा- अभी मुझे प्रधानमंत्री जी और सोनिया गांधी जी का बधाई संदेश मिला है ।

सवाल - मैं इस कामयाबी से पहले की बात कर रहा हूं ..

अरुणिमा- अब उसे छोड़िए, सरकार ने मदद की ,उन्होंने एम्स में भर्ती कराया और इलाज करवाया । चार महीने अस्पताल में रही हूं , तो सरकार ने भी मदद की ,अब मुझे किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं करनी ।

अब तो मैं चाहती हूं कि स्पोर्ट्स एकेडमी खोलूं उन लोगों के लिए जिन्हें दुनिया वाले विकलांग समझते हैं । मुझे युवराज सिंह से बहुत प्रेरणा मिली , लगा कि एक आदमी कैंसर से लड़कर फिर से मैदान में पहुंच सकता है तो फिर कुछ भी नामुमकिन नहीं ।

सवाल - मुझे लगता है कि तुम्हें तो असल में उन लुटेरों का धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने तुम्हें चलती ट्रैन से फेंक दिया और उसके बाद तुम्हारा जुनून जाग गया ।

अरुणिमा- मैं तो सोचती हूं कि उन चोरों के पास इतना दिमाग और ताकत थी तो काश वो उसे किसी अच्छे काम में लगाएं तो बहुत अच्छे मुकाम पर पहुंच पाएंगे ,हमें अपनी ताकत को अच्छे काम के लिए लगाना चाहिए ।

सवाल - आप यूपी से हैं और यूपी तो छोड़िए पूरे मुल्क में लड़कियों , महिलाओं की हालत देखिए, क्या सोचती हो,उनके हालात बदलना मुमकिन है ।

अरुणिमा-लड़कियों के लिए तो हालात बेहद खराब है । लड़कियों के ही नहीं गरीब आदमी , मिडिल क्लास के लिए बहुत मुश्किल है ज़िंदगी ,लेकिन मैं कहती हूं कि हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए।

लड़कियों को बोलती हूं कि हार मत मानो , ये रोनाधोना बंद करो । ये मत कहो कि कोई मुझे सता रहा है, परेशान कर रहा है , मुकाबला करो, डटकर लड़ो. मेरी ये लड़ाई तो मिडिल क्लास लोगों के लिए ही है । हम ना शब्द तो अपनी जि़ंदगी से निकाल ही दें , फिर देखो दुनिया कैसे बदलती है ।

सवाल- अरुणिमा , बहुत शुक्रिया और आगे की ज़िंदगी के लिए बहुत शुभकामनाएं, लेकिन अब एवरेस्ट के बाद किस ऊंचाई पर चढ़ोगी .
अरुणिमा- नहीं , नहीं शुभकामनाएं चाहिए, जिंदगी में अभी तो बहुत कुछ करना है , बहुत आगे बढ़ना है (हंसी, एक्साइटमेंट, गर्माहट बरकरार है)

समाप्त, विजय त्रिवेदी

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